लाहौर की एक युवती ने हाल ही में योग अभ्यास के दौरान एक ऐसा अनुभव साझा किया, जिसने पाकिस्तान में महिलाओं की सार्वजनिक स्वतंत्रता और सामाजिक दृष्टिकोण पर गहरी बहस छेड़ दी है। वह युवती एक सार्वजनिक पार्क में हैंडस्टैंड का अभ्यास कर रही थीं – जो कि योग का एक सामान्य हिस्सा है – जब दो व्यक्तियों ने उनके इस अभ्यास को “अनुचित” बताकर आपत्ति जताई और बाद में पार्क गार्ड की सहायता से उन्हें वहां से हटवा दिया।
महिला ने जब सुरक्षा गार्ड से यह पूछा कि उन्हें घूरने वाले लोगों के खिलाफ कुछ क्यों नहीं कहा गया, तो उत्तर मिला –
“उनकी आंखें तो सील नहीं की जा सकतीं।”
यह एक साधारण जवाब नहीं था, बल्कि समाज में गहराई से जमी उस सोच का संकेत था, जिसमें महिलाओं की उपस्थिति को नियंत्रित किया जाता है, लेकिन पुरुषों की नज़र को स्वतःसिद्ध अधिकार मान लिया जाता है।
योग नहीं, नज़रिया समस्या है
योग एक प्राचीन और विश्वव्यापी रूप से मान्यता प्राप्त अभ्यास है, जिसे अब पाकिस्तान सहित कई देशों में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के लिए अपनाया जा रहा है। लेकिन जब किसी महिला को इसी योग को सार्वजनिक रूप से करने पर अनुचित कहा जाए, तो यह महज योग का विरोध नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न है।
समस्या उसके व्यायाम में नहीं थी, समस्या उन दृष्टिकोणों में थी जो महिला की हर गतिविधि को ‘शालीनता’ की कसौटी पर परखते हैं – वह भी पुरुष-प्रधान मानकों के आधार पर।
पाकिस्तान में महिलाओं के लिए सार्वजनिक जीवन एक संघर्ष क्यों?
आज पाकिस्तान की महिलाएं शिक्षा, चिकित्सा, खेल, विज्ञान, रक्षा और बिज़नेस जैसे क्षेत्रों में उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं। बावजूद इसके, सार्वजनिक स्थलों पर उनकी सहज मौजूदगी आज भी बहस और विवाद का विषय बनी रहती है।
ऐसे में सवाल उठता है –
क्या महिलाओं की जगह अब भी घर की चारदीवारी तक सीमित मानी जा रही है?
क्या समाज इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा कि महिलाएं भी आत्मनिर्भर हैं और सार्वजनिक जीवन में समान भागीदारी की हक़दार हैं?

सामाजिक संरचना में बदलाव आवश्यक
लाहौर की यह घटना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि हम महिलाओं के प्रति कैसा समाज बना रहे हैं – एक ऐसा समाज जो उनकी प्रतिभा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है, या एक ऐसा समाज जो उनके हर कदम पर संदेह करता है?
महिलाएं अब न केवल सवाल पूछ रही हैं, बल्कि अपने हक के लिए आवाज़ भी उठा रही हैं। परन्तु जब जवाब में उन्हें सिर्फ टालने वाले या असंवेदनशील उत्तर मिलते हैं, तो यह व्यवस्था और सोच दोनों पर प्रश्नचिह्न है।
नज़र बदलनी चाहिए, व्यवहार नहीं
महिलाओं को यह बताने की ज़रूरत नहीं कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। असल ज़रूरत यह है कि समाज अपनी नज़रों और दृष्टिकोण को बदले, ताकि महिलाएं अपने जीवन के हर क्षेत्र में बिना भय, बाधा और अपमान के भागीदारी कर सकें।
यदि समाज यह नहीं समझ पाया कि सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, तो यह विकास नहीं, बल्कि पीछे की ओर एक यात्रा है।
अब समय है आत्ममंथन का —
कब तक हम महिलाओं की स्वतंत्रता को दूसरों की नज़रों के आधार पर सीमित करते रहेंगे?