(क्रिमिनल रेफरेंस संख्या – 1 / 2024)
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ
निर्णय दिनांक: 22 जनवरी 2025
आरक्षण दिनांक: 21 अगस्त 2024
मूल अपील से उत्पन्न: Criminal Appeal No. 465 of 1999 (Surendra Prasad Misra & Anr. Vs. State of U.P. & Ors.)
न्यायाधीशों की पीठ (Bench Strength):
– माननीय न्यायमूर्ति संगीता चंद्रा
– माननीय न्यायमूर्ति पंकज भाटिया
– माननीय न्यायमूर्ति मोहम्मद फैज़ आलम खान
(फुल बेंच निर्णय – 3 सदस्यीय पीठ)
विस्तृत मुद्दे (Legal Issues):
1. क्या मजिस्ट्रेट (CJM या अन्य) गैर-जमानती वारंट की अनुपालन में गिरफ्तार अभियुक्त को ज़मानत पर रिहा कर सकते हैं, जब उच्च न्यायालय के आदेश में ज़मानत की कोई विशेष व्यवस्था न हो?
2. क्या उच्च न्यायालय सामान्य (mandatory) आदेश पारित कर सकता है, जिससे सभी मजिस्ट्रेट अभियुक्त को ज़मानत दें, बिना केस-विशेष विवेक का प्रयोग किए?
3. क्या ऐसे सामान्य आदेश मजिस्ट्रेट की न्यायिक स्वतंत्रता और विवेकाधिकार को प्रभावित करते हैं?
4. एक अपील में अभियुक्त या प्रतिवादी की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए CrPC के तहत कौन-कौन से वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं?
5. यदि अभियुक्त अनुपस्थित है, तो क्या कोर्ट Amicus Curiae नियुक्त कर अपील की सुनवाई कर सकता है?
6. क्या अपील की मेरिट पर निर्णय अभियुक्त की अनुपस्थिति में, बिना सूचना या सहमति के, न्यायसंगत हो सकता है?
न्यायालय का निर्णय (What the Court Held):
1. CrPC की धारा 390 के अनुसार, जब किसी अभियुक्त के विरुद्ध अपील की जाती है, तो उच्च न्यायालय गैर-जमानती वारंट जारी कर सकता है। लेकिन यह आदेश अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए है, उसकी स्वतंत्रता छीनने के लिए नहीं।
2. मजिस्ट्रेट को तभी ज़मानत देने की शक्ति है जब हाई कोर्ट के आदेश में स्पष्ट निर्देश हो। यदि ऐसा निर्देश नहीं है, तो मजिस्ट्रेट केवल अभियुक्त को न्यायिक हिरासत में भेज सकते हैं।
3. सामान्य और बाध्यकारी निर्देश (general mandatory direction) मजिस्ट्रेट की विवेकाधीन शक्ति का हनन करते हैं, इसलिए आदेशों को केस-टू-केस आधार पर देना ही न्यायसंगत है।
4. गैर-जमानती वारंट को अंतिम उपाय (last resort) के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। पहले समन, फिर जमानती वारंट और उसके बाद गैर-जमानती वारंट का प्रावधान अपनाया जाना चाहिए।
5. अपील की सुनवाई अभियुक्त की अनुपस्थिति में भी हो सकती है, बशर्ते कि:
– अभियुक्त जानबूझकर अनुपस्थित है।
– उसे सूचना दी गई हो और उसने उपस्थित होने की जिम्मेदारी से बचने का प्रयास किया हो।
– अदालत एक उपयुक्त Amicus Curiae नियुक्त करे।
6. केवल वकील की अनुपस्थिति के आधार पर अपील खारिज नहीं की जा सकती। अदालत को यह सुनिश्चित करना होगा कि अभियुक्त के अधिकारों का उल्लंघन न हो, खासकर Article 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के संदर्भ में।
7. राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) पर ₹50,000 का दंड आरोपित किया जाएगा यदि अभियुक्त की ज़मानत पर रिहाई 30 दिनों के भीतर नहीं होती।
प्रमुख कानूनी संदर्भ:
– CrPC Sections: 70–81, 83, 390, 437, 446, 482
– संविधान: अनुच्छेद 21, 39A, 226, 227
– प्रमुख निर्णय:
– Inder Mohan Goswami vs. State of Uttaranchal
– Anokhi Lal vs. State of M.P.
– Rajoo alias Ramakant vs. State of M.P.
– Satyendra Kumar Antil vs. CBI
– Dhananjay Rai alias Guddu Rai vs. State of Bihar
– Zahira Sheikh vs. State of Gujarat (Best Bakery Case)
निष्कर्ष:
यह निर्णय आपराधिक अपीलों की सुनवाई के दौरान अभियुक्तों की उपस्थिति सुनिश्चित करने और ज़मानत देने की प्रक्रिया में संवैधानिक संतुलन, न्यायिक विवेक और अभियुक्त के मूल अधिकारों की सुरक्षा को महत्व देता है। यह स्पष्ट करता है कि मजिस्ट्रेट केवल तभी ज़मानत दे सकते हैं जब उच्च न्यायालय ऐसा निर्देश दे, अन्यथा नहीं।