दिनांक 8 अप्रैल 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के अंतर्गत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित 10 विधेयकों को स्वीकृति प्रदान कर दी। यह विधेयक लम्बे समय से राज्यपाल के पास लंबित थे, जिनमें से 7 विधेयकों को राष्ट्रपति द्वारा अस्वीकार किया जा चुका था और 2 विधेयक राष्ट्रपति के विचारार्थ लंबित थे। यह निर्णय न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका और संविधान में शक्तियों के पृथक्करण (separation of powers) की वर्तमान व्याख्या को लेकर एक नई बहस को जन्म दे चुका है।
संविधान का अनुच्छेद 142 यह शक्ति देता है कि सर्वोच्च न्यायालय पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक कोई भी आदेश, निर्णय या निर्देश दे सकता है। यह प्रावधान सामान्यतया तभी प्रयोग में लाया जाता है जब विधायी या कार्यपालिका स्तर पर विफलता देखी जाती है और न्याय सुनिश्चित करने के लिए असाधारण हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है।

तमिलनाडु सरकार ने अक्टूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि राज्यपाल ने विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर जानबूझकर कोई निर्णय नहीं लिया, जिससे राज्य की विधायी प्रक्रिया बाधित हुई। इन विधेयकों में मुख्य रूप से राज्य विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति से राज्यपाल की भूमिका हटाकर राज्य सरकार को यह अधिकार देने का प्रावधान था। राज्यपाल ने नवंबर 2023 में इन सभी विधेयकों को अस्वीकृत कर दिया, जिसके बाद राज्य सरकार ने इन्हें फिर से विधानसभा में पारित कर भेजा, लेकिन फिर भी सहमति नहीं दी गई।