[2024] 11 S.C.R. 1 : 2024 INSC 835 Property Owners Association & Ors. v. State of Maharashtra & Ors. (Civil Appeal No. 1012 of 2002) 05 November 2024
पहला मुद्दा: क्या अनुच्छेद 31C अभी भी प्रभावी है?
सुप्रीम कोर्ट ने 5 नवंबर 2024 को Property Owners Association बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि अनुच्छेद 31C, जिसे 1973 में केसवानंद भारती मामले में बरकरार रखा गया था, आज भी पूरी तरह से लागू है।
गौरतलब है कि मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में 42वें संशोधन की धारा 4 को असंवैधानिक करार दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई संशोधन रद्द किया जाता है, तो मूल प्रावधान पुनः प्रभावी हो जाता है। इस प्रकार, अनुच्छेद 31C का पहला भाग अभी भी लागू है।
इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार यदि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के तहत कोई कानून बनाती है, तो उसे कुछ मामलों में मौलिक अधिकारों से ऊपर रखा जा सकता है, लेकिन यह न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा। सरकार को यह साबित करना होगा कि ऐसा कानून समाज के व्यापक हित में है और केवल किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं लाया गया।
दूसरा मुद्दा: क्या सरकार निजी संपत्ति को ‘सामुदायिक संसाधन’ घोषित कर जब्त कर सकती है?
इस फैसले का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू अनुच्छेद 39(b) की व्याख्या है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हर निजी संपत्ति को ‘सामुदायिक संसाधन’ नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में State of Karnataka v. Ranganatha Reddy (1978) मामले में न्यायमूर्ति कृष्ण अय्यर द्वारा दी गई व्याख्या को अस्वीकार कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कोई भी संपत्ति जो समाज की आर्थिक व्यवस्था में योगदान देती है, वह सामुदायिक संसाधन हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि इस पुराने तर्क को स्वीकार कर लिया जाता, तो हर दुकान, फैक्ट्री, और यहाँ तक कि निजी वाहन भी सामुदायिक संसाधन माने जाते। इसी कारण, Sanjeev Coke Manufacturing Co. v. Bharat Coking Coal Ltd. (1983) के फैसले को भी संदिग्ध घोषित किया गया।
तीसरा मुद्दा: ‘वितरण’ (Distribution) की व्याख्या क्या है?
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने निर्णय में कहा कि ‘वितरण’ का अर्थ केवल संपत्ति का सरकारी अधिग्रहण नहीं है, बल्कि इसका तात्पर्य समाज के व्यापक हित में संपत्ति के उपयोग से है। सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि यदि वह किसी संपत्ति को जब्त करना चाहती है, तो यह साबित करना आवश्यक होगा कि वह संपत्ति सामुदायिक हित में है।
इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्णायक मानदंड तय किए हैं:
1. संपत्ति की प्रकृति और विशेषताएँ क्या हैं?
2. क्या वह संपत्ति समाज के कल्याण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है?
3. क्या वह संपत्ति दुर्लभ है?
4. क्या उसका निजी हाथों में रहना समाज के लिए नुकसानदायक है?
चौथा मुद्दा: निजी संपत्ति का अधिकार कितना सुरक्षित?
इस फैसले ने निजी संपत्ति के अधिकार को और मजबूत किया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान को किसी एक आर्थिक विचारधारा से नहीं बाँधा जा सकता। अब सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि कोई संपत्ति सामुदायिक संसाधन के रूप में क्यों और कैसे मानी जाएगी। न्यायपालिका भी आर्थिक मामलों में अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाएगी।
निष्कर्ष:
✅ अनुच्छेद 31C अब भी प्रभावी है।
✅ हर निजी संपत्ति को सामुदायिक संसाधन नहीं माना जा सकता।
✅ सुप्रीम कोर्ट ने संजय कोक और कृष्ण अय्यर की पूर्व व्याख्याओं को अस्वीकार किया।
✅ सरकार को यह साबित करना होगा कि कोई संपत्ति सामुदायिक संसाधन क्यों है।
✅ निजी संपत्ति के अधिकार को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है।
यह फैसला न केवल संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि देश की आर्थिक नीतियों पर भी इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।