THE STATE OF BOMBAY v/s KATHI KALU OGHAD AND OTHERS
AIR 1961 SC 1808; [1962] 3 SCR 10
इस संविधान पीठ के निर्णय में भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(3) के दायरे को स्पष्ट किया गया, जो अभियुक्त को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए विवश करने से सुरक्षा प्रदान करता है। यह मामला उन अपीलों से जुड़ा था जिनमें अभियुक्तों को हस्ताक्षर, अंगूठे के निशान, हथेली या उंगलियों के निशान, या हस्तलेख के नमूने देने के लिए बाध्य किया गया था। विवाद इस बात को लेकर था कि क्या इस प्रकार की कार्यवाही अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करती है।
मुख्य विवाद/प्रश्न:
क्या अभियुक्त से हस्तलेखन, हस्ताक्षर या अंगूठे/उंगलियों/हथेली के निशान लेने को “स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए विवश करना” माना जाएगा?
क्या पुलिस हिरासत में लिए गए ऐसे नमूनों को अनिवार्य रूप से जबरन लिया गया माना जाएगा?
क्या गवाही देने की बाध्यता (testimonial compulsion) में शारीरिक साक्ष्य (जैसे अंगुलियों के निशान) शामिल हैं या केवल व्यक्तिगत ज्ञान पर आधारित मौखिक/लिखित बयान ही इसमें आते हैं?
क्या भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27, जो पुलिस हिरासत में दिए गए बयानों से प्राप्त तथ्यों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करती है, अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करती है?
न्यायालय का निर्णय (What the Court Held):
बहुमत का मत (मुख्य न्यायाधीश बी.पी. सिन्हा एवं अन्य):
“गवाह होना” (to be a witness) का अर्थ है बयान देना या कोई जानकारी देना, न कि केवल शारीरिक साक्ष्य जैसे हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान देना।
ऐसे शारीरिक साक्ष्य देना (जैसे हस्तलेखन या अंगुलियों के निशान), अनुच्छेद 20(3) के तहत गवाह बनने की बाध्यता नहीं मानी जाएगी, इसलिए यह संवैधानिक उल्लंघन नहीं है।
जबरदस्ती (compulsion) का अर्थ बलप्रयोग या दबाव है – केवल पुलिस हिरासत में होना जबरदस्ती नहीं माना जा सकता।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 वैध है, बशर्ते कि उस जानकारी को जबरन नहीं लिया गया हो।
अनुच्छेद 20(3) की सुरक्षा केवल तब लागू होगी जब:
व्यक्ति अभियुक्त हो,
उसे विवश किया गया हो,
विवशता के कारण वह गवाह बना हो,
और वह साक्ष्य स्वयं के खिलाफ हो।
समानांतर (Concurring) मत (न्यायमूर्ति दास गुप्ता, सरकार, एस.के. दास):
बहुमत से सहमति जताई, किंतु यह जोड़ा कि यद्यपि अंगूठे के निशान या हस्ताक्षर देना भी “साक्ष्य प्रदान करना” हो सकता है, लेकिन जब तक वह व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर आत्म-अपराध साबित न करे, तब तक वह “स्वयं के विरुद्ध गवाही” नहीं मानी जाएगी।
स्थापित संवैधानिक सिद्धांत:
अनुच्छेद 20(3) केवल तब लागू होता है जब व्यक्ति को व्यक्तिगत जानकारी देने के लिए विवश किया जाए, न कि जब केवल यांत्रिक/शारीरिक प्रमाण लिया जाए।
अभियुक्त से प्राप्त साक्ष्य को प्रतिबंधित करने के लिए आवश्यक है कि वह जबरन लिया गया हो और आत्म-अपराध की प्रवृत्ति रखता हो।
पुलिस हिरासत में होना मात्र यह सिद्ध नहीं करता कि साक्ष्य जबरन लिया गया।
अंगूठे के निशान, हस्ताक्षर, या शारीरिक अंगों की पहचान करवाना “गवाह बनाना” नहीं है, अतः यह अनुच्छेद 20(3) के अंतर्गत निषिद्ध नहीं है।