I C. GOLAK NATH & ORS. v. STATE OF PUNJAB & ANRS
February 27, 1967
संक्षिप्त सारांश:
इस ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया कि संसद को संविधान के भाग III में वर्णित मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने पंजाब भूमि धारणा सुरक्षा अधिनियम, 1953 और मैसूर भूमि सुधार अधिनियम, 1962 को चुनौती दी थी क्योंकि ये अधिनियम संविधान की 17वीं संशोधन अधिनियम, 1964 के माध्यम से 9वीं अनुसूची में जोड़े गए थे।
ख्य विवाद/मुद्दे:
क्या संसद को अनुच्छेद 368 के तहत मौलिक अधिकारों को संशोधित करने की शक्ति है?
क्या संविधान संशोधन को अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत “कानून (law)” माना जा सकता है?
क्या संसद द्वारा पारित 17वां संशोधन अधिनियम जो मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है, अवैध है?
क्या संविधान संशोधन प्रक्रिया राजनीतिक प्रश्न है जो न्यायिक समीक्षा के बाहर है?
क्या संविधान संशोधन शक्ति अनुच्छेद 368 में निहित है या अनुच्छेद 248 और लिस्ट I, एंट्री 97 के तहत एक सामान्य विधायी शक्ति है?
न्यायालय का निर्णय (What the Court Held):
बहुमत का मत (मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव एवं अन्य):
संविधान का संशोधन “कानून” की श्रेणी में आता है और इसलिए यह अनुच्छेद 13(2) के अधीन है।
संसद मौलिक अधिकारों को समाप्त या सीमित नहीं कर सकती। यह अधिकार संविधान द्वारा लोगों को स्थायी रूप से प्रदत्त किए गए हैं।
संविधान संशोधन शक्ति कोई संप्रभु शक्ति नहीं है जो किसी सीमा से परे हो। यह संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर ही कार्य कर सकती है।
संविधान का अनुच्छेद 368 केवल संशोधन की प्रक्रिया बताता है, यह संशोधन की शक्ति का स्रोत नहीं है।
संविधान के संशोधनों को न्यायिक समीक्षा के अधीन रखा गया है; यह कोई राजनीतिक क्षेत्र नहीं है जिससे न्यायालय दूर रहे।
अदालत ने निर्णय को भविष्य प्रभाव (prospective overruling) के रूप में लागू किया – अर्थात यह निर्णय भविष्य के लिए लागू होगा, पिछली संशोधनों की वैधता पर प्रभाव नहीं डालेगा।
अल्पमत का मत (वान्चू, मित्तेर, रामस्वामी, भगवती, बच्चावत जज):
संविधान संशोधन कोई “कानून” नहीं है, और इसलिए अनुच्छेद 13(2) उस पर लागू नहीं होता।
अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन की शक्ति निहित है और संसद को भाग III में संशोधन करने का पूर्ण अधिकार है।
17वां संशोधन अधिनियम वैध है और यह संसद की विधायी शक्ति के भीतर आता है।
संविधान की संशोधन शक्ति पर कोई आंतरिक या अप्रकट सीमा नहीं होनी चाहिए।
पूर्ववर्ती निर्णयों (जैसे शंकरि प्रसाद और सज्जन सिंह) को सही ठहराया गया।
निष्कर्ष:
बहुमत का फैसला: संसद को मौलिक अधिकारों में संशोधन करने की शक्ति नहीं है। कोई भी ऐसा संशोधन जो इन अधिकारों को समाप्त करता है, अवैध होगा।
इस निर्णय को भविष्य प्रभाव के रूप में लागू किया गया, ताकि पूर्ववर्ती संशोधनों की वैधता बनी रहे।