Gyanendra Singh @ Raja Singh v. State of U.P.
[2025] 3 S.C.R. 490
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में भारतीय दंड संहिता और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO) दोनों के प्रावधान लागू होते हैं, तो POCSO अधिनियम की धारा 42 के अनुसार उस प्रावधान को वरीयता दी जाएगी जिसमें अधिक कठोर दंड निर्धारित है। यह मामला एक नाबालिग बालिका के साथ किए गए गंभीर यौन अपराध से संबंधित था, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2)(f), 376(2)(i) और POCSO अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराया गया था।
अदालत के समक्ष यह प्रश्न उपस्थित हुआ कि जब POCSO अधिनियम की धारा 42 और 42A दोनों लागू हों, तब कौन-सी धारा प्रभावी मानी जाएगी। विशेष रूप से यह तर्क दिया गया कि धारा 42A का उद्देश्य POCSO को अन्य विधियों पर वरीयता देना है, जिससे IPC के कठोर प्रावधानों की जगह POCSO का प्रावधान लागू हो। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए यह कहा कि धारा 42 की भाषा स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करती है कि जहाँ IPC और POCSO दोनों लागू होते हैं, वहाँ अधिक कठोर दंड वाले प्रावधान को प्राथमिकता दी जाएगी।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि IPC की धारा 376(2)(f) और (i) दोनों गंभीर अपराधों से संबंधित हैं और इसमें “प्राकृतिक जीवनकाल तक” कारावास का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है। ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सामान्य आजीवन कारावास की सजा विधिसम्मत और न्यायोचित पाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पृष्ठभूमि में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि और सजा को यथावत रखते हुए यह दोहराया कि ऐसे अपराधों में जहां बच्चे के विरुद्ध यौन अपराध की पुष्टि हो चुकी हो, वहां न्यायिक दृष्टिकोण से अधिकतम सजा की दिशा में गंभीरता आवश्यक है, किंतु कानून द्वारा दी गई न्यूनतम या वैकल्पिक सजा का भी सम्मान किया जाना चाहिए।
यह निर्णय एक बार फिर यह सुनिश्चित करता है कि बाल यौन अपराधों के मामलों में कानूनी प्रणाली सख्त दृष्टिकोण अपनाए और कानून की संरचनात्मक व्याख्या के माध्यम से अधिकतम संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। POCSO और IPC के समवर्ती संचालन की स्थिति में सज़ा निर्धारण की स्पष्टता इस फैसले की प्रमुख विशेषता है।