The Auroville Foundation v. Natasha Storey
[2025] 3 S.C.R. 469
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल उस रिट याचिका को निरस्त कर दिया जिसमें याचिकाकर्ता ने पूर्व में इसी विषय पर दायर याचिका की अस्वीकृति की जानकारी जानबूझकर छिपाई थी। यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता, “clean hands” और “non-suppression of material facts” जैसे सिद्धांतों की पुनः पुष्टि करता है, जिन्हें अदालतें विशेष रूप से रिट क्षेत्राधिकार में अत्यंत गंभीरता से लेती हैं।
प्रकरण में उच्च न्यायालय ने Auroville Foundation द्वारा पारित एक स्टैंडिंग ऑर्डर को निरस्त कर दिया था, जिसे बाद में चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुँचा गया। सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि याचिकाकर्ता ने इसी मुद्दे पर पहले एक याचिका दायर की थी, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा पहले ही खारिज किया जा चुका था। परंतु वर्तमान याचिका में उस तथ्य का कोई उल्लेख नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आचरण को गंभीर कदाचार मानते हुए कहा कि कोई भी याचिकाकर्ता जो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्याय की मांग करता है, उसे पूर्ण ईमानदारी और पारदर्शिता से काम लेना चाहिए। यदि वह न्यायालय से कोई भी तथ्य छिपाता है, विशेषतः ऐसा तथ्य जो निर्णय को प्रभावित कर सकता है, तो उसे रिट राहत की मांग करने का कोई अधिकार नहीं रह जाता।
अदालत ने यह भी पाया कि Auroville Foundation Act, 1988 की धारा 19 के तहत याचिकाकर्ता को उस स्टैंडिंग ऑर्डर को चुनौती देने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं था। इस प्रकार, याचिका न केवल तथ्य छिपाने के आधार पर, बल्कि अधिकार के अभाव में भी असंवैधानिक और अवैध पाई गई।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज किया, बल्कि याचिकाकर्ता Auroville Foundation पर ₹50,000 का जुर्माना भी लगाया। यह राशि याचिकाकर्ता द्वारा न्यायालय के समय और संसाधनों के अनुचित उपयोग के लिए दंडस्वरूप लगाई गई।
यह निर्णय इस सिद्धांत को दोहराता है कि न्यायालय की प्रक्रिया में निष्कपटता और पारदर्शिता अनिवार्य है, और कोई भी पक्ष जो तथ्य छिपाकर न्याय की मांग करता है, उसे राहत पाने का नैतिक और विधिक अधिकार नहीं होता।