State of Assam & Ors. v. Arabinda Rabha & Ors.
[2025] 3 S.C.R. 598
सुप्रीम कोर्ट ने सेवा संबंधी मामलों में चयन सूची के रद्दीकरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण निर्णय में यह स्पष्ट किया कि जब तक चयन प्रक्रिया को सरकार की विधिसम्मत स्वीकृति प्राप्त न हो, तब तक उसे किसी प्रत्याशी का अधिकार नहीं माना जा सकता। यह मामला 2014 में प्रकाशित एक विज्ञापन पर आधारित चयन प्रक्रिया से संबंधित था, जिसे बाद में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) की 4 जुलाई 2016 की रिपोर्ट के आधार पर असम सरकार ने रद्द कर दिया था। रिपोर्ट में चयन प्रक्रिया में भारी अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था।
प्रभावित अभ्यर्थियों ने इस रद्दीकरण को उच्च न्यायालय में चुनौती दी, जहाँ अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप करते हुए चयन सूची को पुनः बहाल कर दिया गया था। परंतु सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप को अनुचित ठहराया और यह स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया सरकार की अंतिम स्वीकृति से पूर्व केवल एक अनुशंसा होती है, न कि नियुक्ति का अधिकार।
न्यायालय ने Wednesbury unreasonableness और proportionality जैसे प्रशासनिक विधि सिद्धांतों पर भी विस्तार से चर्चा की और यह निष्कर्ष दिया कि राज्य सरकार का चयन प्रक्रिया को रद्द करना न तो मनमाना था और न ही अनुपातहीन। रिपोर्ट में बताई गई गड़बड़ियों के आलोक में यह निर्णय लोकहित में लिया गया था और यह प्रशासनिक विवेक का भाग था, जो न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं बनता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि नियुक्तियों से संबंधित नीति-निर्णयों में न्यायालय को अत्यंत सीमित हस्तक्षेप करना चाहिए, विशेषकर तब जब निर्णय सार्वजनिक हित में हो और उसकी पृष्ठभूमि में ठोस तथ्यों और निष्पक्ष जांच रिपोर्ट का आधार हो। जब तक कोई निर्णय स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण, मनमाना, या असंवैधानिक न हो, तब तक न्यायालयों को प्रशासनिक प्रक्रिया में अवरोध नहीं डालना चाहिए।
इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के निर्णय को रद्द करते हुए राज्य सरकार द्वारा चयन सूची के रद्दीकरण को वैध और न्यायोचित ठहराया। यह निर्णय सेवा क्षेत्र में चयन प्रक्रियाओं की वैधता, सरकारी स्वीकृति की अनिवार्यता और न्यायिक समीक्षा की मर्यादा को स्पष्ट करने वाला एक प्रमुख उदाहरण है।