मामला: Sukhpal Singh Khaira v. The State of Punjab
न्यायालय: सुप्रीम कोर्ट
निर्णय दिनांक: 05 दिसम्बर 2022
विवरण: [2022] 10 S.C.R. 156
प्रमुख संवैधानिक एवं विधिक प्रश्न:
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने तीन महत्वपूर्ण प्रश्नों का उत्तर दिया:
- क्या जब सह-आरोपियों के विरुद्ध विचारण समाप्त हो चुका हो तथा उसी दिन निर्णय सुनाया गया हो, तो भी धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त अभियुक्त को समन जारी किया जा सकता है?
- क्या जब कुछ सह-अभियुक्त जो पहले भगोड़े थे, अब गिरफ्तार होकर पृथक् रूप से विचारणाधीन हैं, तब भी मुख्य विचारण में धारा 319 के तहत समन किया जा सकता है?
- इस शक्ति के प्रयोग के लिए न्यायालय को कौन-कौन से दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए?
बहुमत निर्णय (न्यायमूर्ति ए.एस. बोपन्ना द्वारा):
सुप्रीम कोर्ट ने धारा 319 CrPC की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह शक्ति तभी प्रयोग की जा सकती है जब मूल विचारण की समाप्ति से पहले निर्णय नहीं सुनाया गया हो। यदि अभियुक्त दोषी ठहराया गया है, तो समन आदेश सज़ा सुनाने से पहले पारित किया जाना चाहिए। यदि अभियुक्त बरी होता है, तो समन आदेश निर्णय सुनाने से पहले पारित होना चाहिए। यदि समन आदेश निर्णय (conviction या acquittal) के बाद पारित होता है, तो वह विधिक रूप से अवैध माना जाएगा।
मुख्य बिंदु:
- ट्रायल की समाप्ति का अर्थ केवल साक्ष्य समापन नहीं बल्कि निर्णय (judgment) एवं सज़ा (sentence) की घोषणा तक होता है।
- धारा 319 की शक्ति उस स्थिति में भी प्रयोग की जा सकती है जब भगोड़े अभियुक्तों के विरुद्ध विचारण अलग कर दिया गया हो। लेकिन, इस शक्ति का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब पृथक् विचारण में ऐसे साक्ष्य आए हों जो उस अतिरिक्त अभियुक्त की संलिप्तता को दर्शाएं।
- मुख्य विचारण में प्राप्त साक्ष्य का उपयोग पृथक विचारण में किसी अन्य व्यक्ति को आरोपी बनाने के लिए नहीं किया जा सकता यदि धारा 319 की शक्ति मुख्य विचारण के दौरान प्रयोग नहीं की गई थी।
दिए गए दिशा-निर्देश (Guidelines under Para 33):
- यदि किसी अन्य व्यक्ति की संलिप्तता का साक्ष्य आता है, तो न्यायालय को विचारण रोक देना चाहिए और पहले यह निर्णय करना चाहिए कि उसे समन किया जाए या नहीं।
- यदि समन आदेश पारित किया जाता है, तो मुख्य विचारण के आगे की कार्यवाही उससे पहले नहीं होनी चाहिए।
- समन किए गए अभियुक्त का विचारण संयुक्त या पृथक् रूप से किया जाए, यह न्यायालय के विवेक पर निर्भर करेगा।
- यदि संयुक्त विचारण करना है तो सभी आरोपियों के लिए नवीन विचारण (de novo trial) आवश्यक होगा और सभी गवाहों को दोबारा जिरह में लाना होगा।
- यदि समन अलग विचारण हेतु किया गया है, तो मुख्य अभियुक्तों के विरुद्ध निर्णय दिया जा सकता है और फिर नए अभियुक्त के विरुद्ध प्रक्रिया आरंभ हो सकती है।
प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या:
- धारा 319 CrPC: यह शक्ति न्यायालय को प्रदान करती है कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को आरोपी बनाए जो पूर्व में आरोपित नहीं था लेकिन साक्ष्य से उसके विरुद्ध अपराध में संलिप्तता पाई जाती है।
- धारा 232 CrPC: यदि अभियुक्त के विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं है, तो न्यायालय बरी का आदेश देगा।
- धारा 235 CrPC: दोष सिद्ध होने पर पहले अभियुक्त को सज़ा पर सुनवाई का अवसर मिलेगा और फिर सज़ा सुनाई जाएगी।
- धारा 273 CrPC: नए आरोपी के लिए सबूतों की पुनः जिरह अनिवार्य है।
न्यायिक निष्कर्ष:
इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि धारा 319 CrPC की शक्ति ट्रायल समाप्ति से पूर्व ही प्रयोग की जा सकती है। यदि निर्णय और सज़ा सुना दी गई हो, तो उसके बाद इस धारा के तहत नया अभियुक्त नहीं जोड़ा जा सकता। हालांकि, यदि किसी अलग विचारण (split trial) में नए साक्ष्य उभरते हैं, तो उस विचारण के दौरान उस आधार पर नया अभियुक्त जोड़ा जा सकता है।
प्रमुख पूर्ववर्ती निर्णय जिनका उल्लेख किया गया:
1. Hardeep Singh v. State of Punjab (2014) 3 SCC 92 : [2014] 2 SCR 1
प्रभाव:
यह निर्णय धारा 319 CrPC की व्यापक और निर्णायक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसमें स्पष्ट किया गया था कि:
- धारा 319 की शक्ति अत्यधिक अपवादात्मक है।
- यह शक्ति साक्ष्य के आधार पर और सुनवाई के दौरान ही प्रयोग की जा सकती है।
- “Could be tried together with the accused” को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि इससे संयुक्त विचारण अनिवार्य हो जाए।
उद्धरण: न्यायालय ने कहा कि यह शक्ति केवल तभी प्रयोग हो सकती है जब मूल विचारण लंबित हो और निर्णय अभी नहीं दिया गया हो।
2. Shashikant Singh v. Tarkeshwar Singh (2002) 5 SCC 738 : [2002] 3 SCR 400
प्रभाव:
इस निर्णय में कहा गया था कि धारा 319 CrPC के तहत “could be tried together with the accused” को अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक (directory) रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इसमें यह स्वीकार किया गया कि भले ही मुख्य अभियुक्त के विरुद्ध विचारण समाप्त हो चुका हो, नवीन आरोपी के विरुद्ध पृथक विचारण जारी रह सकता है।
परिणाम:
इस निर्णय में यह स्थिति स्वीकार की गई थी कि मुख्य ट्रायल समाप्त हो जाने के बाद भी पूर्व में पारित समन आदेश लागू रह सकता है।
3. Rama Narang v. Ramesh Narang (1995) 2 SCC 513 : [1995] 1 SCR 456
प्रभाव:
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि क्रिमिनल ट्रायल तब तक पूरा नहीं होता जब तक अभियुक्त को सज़ा नहीं दी जाती। केवल दोषसिद्धि से ट्रायल समाप्त नहीं माना जा सकता।
प्रासंगिकता:
इस निर्णय के आधार पर यह व्याख्या दी गई कि धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग सज़ा सुनाए जाने से पहले किया जाना चाहिए, क्योंकि सज़ा तक विचारण चल रहा माना जाएगा।
4. Yakub Abdul Razak Memon v. State of Maharashtra (2013) 13 SCC 1 : [2013] 15 SCR 1
प्रभाव:
इस केस में भी यही पुष्टि हुई कि जब तक सज़ा नहीं सुनाई जाती, फैसले को पूर्ण और अंतिम नहीं माना जा सकता।
प्रासंगिक उद्धरण:
“Conviction order is not a ‘judgment’ as contemplated under Section 353, and judgment is pronounced only after the award of sentence.”
5. Rajendra Singh v. State of U.P. (2007) 7 SCC 378 : [2007] 8 SCR 834
6. Manjit Singh v. State of Haryana (2021) SCC Online SC 632
भूमिका:
इन निर्णयों में यह स्थापित किया गया कि यदि किसी अभियुक्त की भूमिका साक्ष्य से उजागर होती है, तो न्यायालय के पास यह शक्ति है कि वह उसे अभियुक्त बनाकर विचारण कर सके। इन फैसलों ने धारा 319 की शक्ति के दायरे और प्रासंगिकता को पुष्ट किया।
निष्कर्ष:
Sukhpal Singh Khaira मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उपरोक्त निर्णयों का समन्वय करते हुए यह स्पष्ट किया कि:
- धारा 319 CrPC की शक्ति “ट्रायल के पूर्ण समापन (i.e., सज़ा सुनाए जाने) से पहले ही प्रयोग होनी चाहिए।
- “Could be tried together” एक निर्देशात्मक भाषा है, बाध्यकारी नहीं।
- पुराने निर्णयों की मिसालों के साथ, अब यह सुनिश्चित किया गया है कि कोई आरोपी केवल प्रक्रियात्मक चूक से न बच निकले, किंतु विधिक प्रक्रिया का सम्मान बना रहे।
प्रभाव:
यह निर्णय भारतीय आपराधिक प्रक्रिया संहिता में धारा 319 की शक्ति के सीमित और न्यायोचित प्रयोग को सुनिश्चित करता है ताकि अभियोजन प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और विधि के अनुसार हो।