जनसंख्या आधारित परिसीमन पर नई बहस – दक्षिण भारत की चिंताएं और लोकतंत्र की दिशा

विधि विशेष

विशेष रिपोर्ट

देश में एक बार फिर परिसीमन का मुद्दा जोर पकड़ रहा है। जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों के पुनर्गठन की प्रक्रिया से दक्षिण भारत के राज्यों, विशेष रूप से तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में गहरी चिंता उत्पन्न हो गई है। इन राज्यों का मानना है कि यदि केवल जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का आधार बनाया गया, तो उन्हें उन उपलब्धियों के लिए दंडित किया जाएगा जो उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास के क्षेत्र में वर्षों की मेहनत से हासिल की हैं।

दक्षिण भारत के राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और जनसंख्या नियंत्रण जैसे क्षेत्रों में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन किया है। इसके परिणामस्वरूप उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम रही है। अब, जब जनगणना आधारित परिसीमन की बात उठी है, तो इन राज्यों को लोकसभा में सीटों की संभावित कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में अधिक जनसंख्या वृद्धि के कारण सीटों की संख्या बढ़ सकती है।

इस मुद्दे ने उत्तर-दक्षिण राजनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय असंतोष को एक नई दिशा दे दी है। दक्षिण भारत के नेताओं का तर्क है कि वे अपने विकासशील और जनहितकारी नीतियों के कारण इस तरह के प्रतिकूल प्रभाव के हकदार नहीं हैं। इसके अलावा, हिंदी भाषा को लेकर केंद्र की नीतियों और केंद्रीय शक्तियों के एकीकरण के प्रयासों से क्षेत्रीय तनाव पहले से ही बढ़ा हुआ है।

राजनीतिक दलों के भीतर भी इस विषय पर विरोधाभास उभर रहा है। एक ओर राष्ट्रीय नेतृत्व संविधान और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व की बात करता है, तो दूसरी ओर राज्य स्तरीय इकाइयाँ क्षेत्रीय हितों की रक्षा को प्राथमिकता दे रही हैं। वर्तमान में लोकसभा में सीटों की संख्या स्थिर रखी गई है, परंतु इससे प्रत्येक सांसद को औसतन बीस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करना पड़ता है, जो व्यावहारिक रूप से अत्यंत कठिन है।

इस बहस से उबरने और समाधान की ओर बढ़ने के लिए कुछ विकल्पों पर चर्चा चल रही है। पहला प्रस्ताव यह है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ा दी जाए ताकि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटें कम न हों और अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अतिरिक्त प्रतिनिधित्व मिल सके। दूसरा सुझाव है कि राज्यसभा की संरचना में बदलाव करके उसे अधिक संघीय स्वरूप दिया जाए, जिससे क्षेत्रीय संतुलन बना रहे। इन उपायों पर अमल के लिए संविधान में संशोधन आवश्यक होगा।

यह समझना जरूरी है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में केवल संख्यात्मक प्रतिनिधित्व ही पर्याप्त नहीं होता। संघीय संरचना का सम्मान और छोटे राज्यों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अतीत के परिसीमन उदाहरणों में भी यह सिद्धांत अपनाया गया है कि हर राज्य को न्यूनतम प्रतिनिधित्व दिया जाए, चाहे उसकी जनसंख्या कितनी भी हो।

इसलिए यह आवश्यक है कि परिसीमन से जुड़ी बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर लोकतंत्र और संघवाद के व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाए। प्रतिनिधित्व का विस्तार किए बिना मौजूदा सीटें न घटाने का रास्ता इस दिशा में एक व्यावहारिक और न्यायसंगत समाधान हो सकता है।

समग्र रूप में, परिसीमन एक संवेदनशील विषय है जिसे संतुलित दृष्टिकोण और राष्ट्रीय एकता की भावना के साथ सुलझाना समय की मांग है। भारत को ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो क्षेत्रीय विविधता, सामाजिक प्रगति और लोकतांत्रिक भागीदारी को समान रूप से महत्व दें।

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