मामला:
Neeraj Dutta v. State (Govt. of NCT of Delhi)
Criminal Appeal No. 1669 of 2009
[2022] 5 S.C.R. 104
संविधानात्मक/विधिक मुद्दे:
क्या जब शिकायतकर्ता की गवाही उपलब्ध नहीं है (मृत्यु, असहयोग, या अनुपलब्धता के कारण), तब भी केवल परिस्थितिजन्य (circumstantial) साक्ष्य या अन्य गवाहों के माध्यम से, लोक सेवक के विरुद्ध भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 7 एवं 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के अंतर्गत दोष सिद्ध किया जा सकता है?
बहुमत का निर्णय (न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना द्वारा):
संविधान पीठ ने यह ठहराया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 एवं 13(1)(d) सहपठित धारा 13(2) के अंतर्गत अभियोजन को दोष सिद्ध करने हेतु “अवैध अनुग्रहरण की मांग और स्वीकृति” का प्रमाण देना अनिवार्य है।
हालांकि, यदि शिकायतकर्ता की सीधी मौखिक या दस्तावेजी गवाही अनुपलब्ध है, तो अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा उक्त तत्वों को प्रमाणित कर सकता है। इन साक्ष्यों में अन्य स्वतंत्र गवाहों की गवाही, तकनीकी साक्ष्य (जैसे ट्रैप टीम की रिपोर्ट), तथा आरोपी की संलिप्तता की स्थितिजन्य परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं।
अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 114 तथा भ्रष्टाचार अधिनियम की धारा 20 के अंतर्गत विधिक अनुमान (legal presumption) का सहारा लिया जा सकता है, बशर्ते अभियोजन यह सिद्ध कर दे कि आरोपी ने “अनुग्रहरण स्वीकार किया” था।
महत्वपूर्ण अवलोकन:
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
- “मांग” को “स्वीकृति” से अलग और स्वतंत्र तत्व के रूप में देखा जाना चाहिए
- “स्वीकृति” यदि परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा प्रमाणित हो जाती है, तो धारा 20 की विधिक अनुमान की शक्ति लागू होती है
- लेकिन अभियोजन को न्यूनतम यह दिखाना होगा कि आरोपी ने अवैध अनुग्रहरण स्वीकार किया, तब ही अनुमान खड़ा किया जा सकता है
अल्पमत निर्णय:
इस निर्णय में कोई स्पष्ट अल्पमत राय नहीं थी। सभी न्यायाधीशों ने बहुमत के साथ सहमति व्यक्त की।
प्रासंगिक विधिक प्रावधान:
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 13(1)(d), 13(2), और 20
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 3, 4, 59, 60, 61, 114
प्रमुख मामलों का उल्लेख:
- B. Jayaraj v. State of A.P. (2014)
- P. Satyanarayana Murthy v. D. Inspector of Police (2015)
- M. Narsinga Rao v. State of A.P. (2001)
- Hazari Lal v. State (Delhi Admn.) (1980)
- C.K. Damodaran Nair v. Government of India (1997)
- Sharad Birdhichand Sarda v. State of Maharashtra (1984)
निष्कर्ष:
यदि शिकायतकर्ता की गवाही अनुपलब्ध हो, तो भी अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्य द्वारा अवैध अनुग्रहरण की मांग और स्वीकृति सिद्ध कर सकता है। ऐसी स्थिति में विधिक अनुमान का प्रयोग न्यायसंगत है, बशर्ते यह स्थापित किया जाए कि आरोपी ने अनुग्रहरण स्वीकार किया था। यह निर्णय अभियोजन के लिए कानूनी सुगमता प्रदान करता है, विशेषकर जब मुख्य गवाह अनुपलब्ध हो।