देश की प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार बढ़ते पेपर लीक, संगठित नकल गिरोहों की सक्रियता, डिजिटल उपकरणों से धोखाधड़ी और परीक्षा केंद्रों पर संस्थागत मिलीभगत जैसे मामलों ने केंद्र सरकार को एक विशेष विधायी कदम उठाने के लिए बाध्य किया। इसी क्रम में संसद द्वारा पारित “सार्वजनिक परीक्षाओं (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024” एक सशक्त और केंद्रित प्रयास है, जिसका उद्देश्य परीक्षा प्रणाली की शुचिता को बनाए रखना और दोषियों पर कठोर कार्यवाही करना है।
यह अधिनियम देशभर में लागू होगा और इसके अंतर्गत केंद्र या राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सभी सार्वजनिक परीक्षाएँ आती हैं। अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि अनुचित साधनों के अंतर्गत प्रश्न पत्र या उत्तर कुंजी का लीक होना, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सहायता लेना, किसी और के स्थान पर परीक्षा देना, पहचान छिपाकर बैठना, या संगठित रूप से परीक्षार्थियों की सहायता करना आता है। इसके अतिरिक्त, निजी संस्थाओं, परीक्षा सेवा प्रदाताओं और व्यक्तियों की भूमिका को भी परिभाषित किया गया है जो परीक्षा संचालन या प्रबंधन में शामिल होते हैं।
प्रावधानों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर प्रश्न पत्र चुराता है, लीक करता है या परीक्षा से पहले वितरित करता है, तो यह अपराध माना जाएगा। इसी प्रकार, यदि कोई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से नकल कराने या उत्तर साझा करने में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे अनुचित साधनों की श्रेणी में रखा जाएगा। परीक्षा केंद्रों पर संगठित रूप से नकल की सुविधा उपलब्ध कराना या ऐसे प्रयासों को संरक्षण देना भी इस कानून के अंतर्गत अपराध है।
सबसे महत्त्वपूर्ण प्रावधान अधिनियम में संगठित अपराध को लेकर किया गया है। यदि कोई समूह, संस्था या सेवा प्रदाता व्यवसायिक उद्देश्य से परीक्षाओं में अनुचित साधनों का प्रयोग करता है या उसे बढ़ावा देता है, तो उसे “संगठित अपराधी इकाई” माना जाएगा। इस स्थिति में संस्थाओं के प्रमुख, निदेशक, या संबंधित अधिकारी भी व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी माने जाएंगे।
दंड की बात करें तो, इस अधिनियम के अंतर्गत सामान्य अपराध के लिए 3 से 5 वर्षों तक की सजा और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना निर्धारित है। वहीं यदि मामला संगठित अपराध का पाया जाता है, तो दोषी को 5 से 10 वर्ष तक की सजा और 1 करोड़ रुपये तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, संलिप्त व्यक्ति या संस्था की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी अधिनियम में मौजूद है।
कानून के क्रियान्वयन की प्रक्रिया को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है। किसी भी अपराध की जांच केवल उप पुलिस अधीक्षक (Deputy SP) या उससे उच्च अधिकारी द्वारा की जा सकेगी। अधिकांश अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती होंगे, जिससे पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की अनुमति प्राप्त होगी और अदालत द्वारा जमानत देने से पूर्व गंभीर विचार करना होगा।
यह अधिनियम न केवल धोखेबाज़ परीक्षार्थियों और माफियाओं पर शिकंजा कसता है, बल्कि ईमानदारी से परीक्षा आयोजित करने वाले कर्मचारियों को भी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। यह उन्हें निडर होकर कार्य करने और किसी भी अनैतिक दबाव से स्वतंत्र रहने का अवसर देता है।
इस कानून की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसकी अनुपालना कितनी ईमानदारी से की जाती है और राज्य सरकारें इसे कितनी सख्ती से लागू करती हैं। लेकिन निस्संदेह, यह अधिनियम भारतीय परीक्षा प्रणाली में एक बड़ी और महत्त्वपूर्ण पहल है, जो लाखों ईमानदार परीक्षार्थियों के हितों की रक्षा करेगा।
