Periyammal (Dead) through LRs & Ors. v. V. Rajamani & Anr. etc.
[2025] 3 S.C.R. 540
सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXI नियम 97 और 101 तथा धारा 47 की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि निष्पादन न्यायालय का कार्य केवल डिक्री के निष्पादन तक सीमित होता है, वह डिक्री की वैधता या मेरिट पर पुनर्विचार नहीं कर सकता। यह मामला उस स्थिति से संबंधित था जहाँ डिक्रीधारी द्वारा डिक्री निष्पादन की प्रक्रिया शुरू की गई थी, परंतु प्रतिवादी संख्या 1 और 2 ने डिक्री को चुनौती देने हेतु कृषक पट्टेदार होने का दावा करते हुए निष्पादन में हस्तक्षेप किया।
प्रतिवादियों ने आदेश XXI नियम 97 के तहत आवेदन प्रस्तुत किया, जबकि उन्होंने मूल वाद में कोई प्रतिवाद नहीं किया और न ही कृषक पट्टेदारी से संबंधित कोई दस्तावेज़ या वैध साक्ष्य प्रस्तुत किया। सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि आदेश XXI नियम 97 के अंतर्गत केवल डिक्री के निष्पादन में बाधा डालने वालों की आपत्ति का निस्तारण किया जा सकता है, न कि डिक्री की वैधता पर पुनर्विचार किया जा सकता है। डिक्री की वैधता पर प्रश्न उठाने का स्थान निष्पादन प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपील या पुनर्विचार की प्रक्रिया होती है।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि इस प्रकार की आपत्तियों का प्रयोग डिक्री के निष्पादन को अनावश्यक रूप से विलंबित करने हेतु किया जाता है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अदालत ने Rahul S. Shah बनाम याचिका में दिए गए उस महत्वपूर्ण निर्देश को दोहराया जिसमें कहा गया था कि डिक्री निष्पादन की प्रक्रिया को डिक्री के प्रस्तुत होने की तिथि से छह माह के भीतर अनिवार्य रूप से पूर्ण कर लिया जाना चाहिए।
इस निर्देश को प्रभावी बनाने हेतु सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि देश भर के सभी उच्च न्यायालयों को चाहिए कि वे अपने अधीनस्थ न्यायालयों से लंबित निष्पादन वादों का विवरण प्राप्त करें और यह सुनिश्चित करें कि सभी निष्पादन याचिकाएं छह माह की अवधि में अनिवार्य रूप से निपटाई जाएं। यदि कोई न्यायिक अधिकारी इस अवधि का पालन नहीं करता है, तो उसे प्रशासनिक स्तर पर उच्च न्यायालय के समक्ष उत्तरदायी ठहराया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पृष्ठभूमि में निष्पादन न्यायालय द्वारा पारित आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए रद्द कर दिया और निष्पादन प्रक्रिया को शीघ्रता से पूर्ण करने का निर्देश दिया। यह निर्णय न्यायिक दक्षता और न्याय प्राप्ति की समयसीमा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता को रेखांकित करता है और निष्पादन से संबंधित अनावश्यक तकनीकी अड़चनों को समाप्त करने की दिशा में एक दृढ़ कदम है।