विवाह के दो वर्षों में पत्नी की संदिग्ध मृत्यु: सुप्रीम कोर्ट ने सास-ससुर की जमानत रद्द की

विधि विशेष

Shabeen Ahmad v. The State of Uttar Pradesh & Anr.
[2025] 3 S.C.R. 367

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि यदि विवाह के दो वर्षों के भीतर पत्नी की मृत्यु संदेहास्पद परिस्थितियों में हो और आरोप दहेज की मांग तथा क्रूरता से संबंधित हों, तो ऐसे मामलों में अभियुक्तों को जमानत प्रदान करना न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी (दहेज मृत्यु), 498ए (पति या रिश्तेदार द्वारा क्रूरता), तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 की धारा 3 और 4 से संबंधित था।

प्रकरण में आरोप था कि विवाह के पश्चात मृतका को दहेज की मांग को लेकर लगातार प्रताड़ित किया गया और उसकी मृत्यु संदेहास्पद परिस्थितियों में हो गई। मृतका की माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई प्राथमिकी में विशेष रूप से सास-ससुर को नामित किया गया था और उन पर गंभीर आरोप लगाए गए थे कि उन्होंने लगातार दहेज की मांग की और मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया।

उच्च न्यायालय ने प्रारंभ में सास और ससुर को जमानत प्रदान कर दी थी, जिसे चुनौती देते हुए मृतका के परिवार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए यह पाया कि प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर प्रकृति के हैं, और मृतका की मृत्यु विवाह के दो वर्षों के भीतर हुई थी। ऐसे में जमानत दिए जाने से जांच व साक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं और पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने में बाधा आ सकती है।

अदालत ने यह भी माना कि दहेज के आरोपों की गंभीरता और अभियुक्तों की कथित भूमिका को देखते हुए जमानत रद्द किया जाना आवश्यक है ताकि न्याय की प्रक्रिया बाधित न हो। हालांकि, मामले में अन्य सहअभियुक्ताओं—ननदों की भूमिका सीमित पाई गई और उनके खिलाफ प्रत्यक्ष आरोप या संलिप्तता का कोई ठोस आधार नहीं था। अतः उनकी जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने यथावत बनाए रखा।

यह निर्णय दहेज प्रथा के खिलाफ कड़ा संदेश देता है और स्पष्ट करता है कि ऐसे मामलों में यदि प्रथम दृष्टया संलिप्तता प्रमाणित हो रही हो, तो अभियुक्तों को संरक्षण देना उचित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का यह दृष्टिकोण महिलाओं की सुरक्षा एवं विवाहोत्तर उत्पीड़न के विरुद्ध न्यायिक प्रणाली की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है।

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