Sharmila Velamur v. V. Sanjay and Ors.
[2025] 3 S.C.R. 377
सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षकता विवाद में यह स्पष्ट किया कि यदि कोई बच्चा गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति से पीड़ित है और स्वतंत्र निर्णय लेने में अक्षम है, तो उसकी संरक्षकता का निर्धारण उसकी सर्वोत्तम भलाई के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि तकनीकी अधिकारों पर। यह मामला एक अमेरिकी नागरिक मां और भारतीय पिता के मध्य विवाद से संबंधित था, जहाँ बच्चा ‘A’ अटैक्सिक सेरेब्रल पाल्सी नामक दुर्बल विकार से ग्रस्त था।
अदालत के समक्ष तथ्य यह था कि अमेरिका की एक विधिक प्रक्रिया के तहत ‘A’ की अभिरक्षा मां को दी गई थी, किन्तु पिता उसे भारत ले आया और यहीं रखा। जब मामला उच्च न्यायालय में पहुँचा, तो वहां से बच्चा पिता के साथ ही रहने दिया गया। माँ ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए इस आदेश को चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में NIMHANS और अमेरिका स्थित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्टों पर विशेष भरोसा जताया, जिनमें यह स्पष्ट रूप से उल्लेख था कि बच्चा ‘A’ किसी भी प्रकार का स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ है और उसे विशेष चिकित्सकीय देखभाल, स्थिर परिवेश और भावनात्मक समर्थन की आवश्यकता है। इन रिपोर्टों में यह भी स्पष्ट किया गया कि बच्चे की भलाई उसके मूल परिवेश—अर्थात अमेरिका में मां के साथ रहने में निहित है, जहाँ उसका उपचार और आवश्यक देखभाल सुनिश्चित की गई थी।
न्यायालय ने उच्च न्यायालय के आदेश को त्रुटिपूर्ण मानते हुए उसे निरस्त कर दिया। यह माना गया कि जब कोई बच्चा मानसिक या शारीरिक रूप से इतना निर्भर हो कि वह अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं नहीं कर सकता, तब अदालतों का यह कर्तव्य बनता है कि वे केवल कानूनी अधिकारों पर नहीं, बल्कि बच्चे की संपूर्ण सुरक्षा और हित पर ध्यान दें।
इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने बच्चा ‘A’ की संरक्षकता पुनः उसकी मां को सौंप दी और आदेश दिया कि उसे अमेरिका वापस भेजा जाए, जहाँ उसकी चिकित्सा, शिक्षा और भावनात्मक देखभाल के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध है।
यह निर्णय विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की न्यायिक दृष्टि को दर्शाता है और यह सुनिश्चित करता है कि संरक्षकता संबंधी निर्णय केवल जैविक रिश्तों पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक और मानवीय दृष्टिकोण से किए जाएं।