बिजली अधिनियम 2003 की धारा 63 की शाब्दिक व्याख्या और राज्य विद्युत आयोग के कर्तव्यों की न्यायिक पुष्टि

न्यायिक प्रक्रिया

MUNICIPAL CORPORATION OF DELHI vs. GAGAN NARANG & ORS. ETC.

SCR Citation: [2025] 1 S.C.R. 239

बिजली अधिनियम की धारा 63 की व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बिजली अधिनियम 2003 की धारा 63 से संबंधित एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया है कि जब किसी कानून की भाषा स्पष्ट हो और उससे विधायिका की मंशा साफ झलकती हो, तो न्यायालय को उसमें अपने स्तर पर कोई शब्द जोड़ने, हटाने या बदलने का अधिकार नहीं होता।

न्यायालय ने कहा कि यदि अधिनियम की सामान्य और सीधी भाषा किसी प्रकार की अस्पष्टता या अनर्थकारी परिणाम उत्पन्न नहीं कर रही हो, तो उसकी शाब्दिक व्याख्या ही अपनाई जानी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक व्याख्या के माध्यम से अधिनियम की मूल भावना से छेड़छाड़ करना पूरी तरह अनुचित है।

बिजली अधिनियम की धारा 63 यह प्रावधान करती है कि यदि निविदा प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से पूरी की गई है और वह केंद्र सरकार की निर्धारित दिशा-निर्देशों के अनुसार है, तो राज्य आयोग उस निविदा में निर्धारित शुल्क को स्वीकार कर सकता है। इस धारा में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि केवल वितरण लाइसेंसधारी या विद्युत उत्पादन कंपनी ही इस प्रावधान का उपयोग कर सकती है।

इस मामले में अपीलीय न्यायाधिकरण ने यह कहते हुए अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी थी कि वह न तो डिस्कॉम है और न ही एक जेनरेटर, इसलिए वह धारा 63 के अंतर्गत निविदा शुल्क की स्वीकृति के लिए आवेदन नहीं कर सकता।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि अपीलीय न्यायाधिकरण ने धारा 63 की अलग-थलग और अत्यधिक तकनीकी व्याख्या की, जो विधायिका की मंशा के विरुद्ध है।

न्यायालय ने यह भी दोहराया कि धारा 63 को धारा 86 उपधारा एक खंड (ख) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो राज्य विद्युत आयोग को यह अधिकार देती है कि वह टैरिफ संबंधी मामलों को नियंत्रित करे और सार्वजनिक हित में संतुलन बनाए रखे।

इसके साथ ही अदालत ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के नियम 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत अपीलकर्ता को ‘कचरे से ऊर्जा’ परियोजना स्थापित करना अनिवार्य था। इसलिए इस परियोजना के लिए टैरिफ अपनाने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता दी गई।

अंत में न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में पर्यावरण हित और जनहित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, खासकर तब जब यह परियोजना दिल्ली जैसे महानगर में कचरे के प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन दोनों को साथ लेकर चलती है।

इस प्रकार दिल्ली विद्युत नियामक आयोग द्वारा पारित आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने वैध करार देते हुए उसकी पुष्टि की है।

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