प्रमुख वाद:
Rojer Mathew बनाम South Indian Bank Ltd. एवं अन्य
नागरिक अपील संख्या: 8588 / 2019
निर्णय तिथि: 13 नवम्बर 2019
मुख्य संवैधानिक प्रश्न:
इस वाद में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह मूल प्रश्न था कि क्या वित्त अधिनियम, 2017 (विशेषकर अध्याय XIV) को संविधान के अनुच्छेद 110 के अंतर्गत मनी बिल के रूप में वैधता प्राप्त है, विशेषतः जब उस अधिनियम के कई प्रावधान न्यायाधिकरणों के पुनर्गठन, नियुक्तियों और सेवा शर्तों से संबंधित हैं जो मनी बिल की परिधि में प्रतीत नहीं होते। साथ ही, न्यायाधिकरणों पर लागू धारा 184 और उससे संबंधित Tribunal Rules, 2017 की संवैधानिकता का भी परीक्षण किया गया।
प्रासंगिक विधिक प्रावधान:
अनुच्छेद 110 – मनी बिल की परिभाषा
अनुच्छेद 323A, 323B – न्यायाधिकरणों की स्थापना
अनुच्छेद 226, 227 – उच्च न्यायालय की पुनरीक्षणीय अधिकारिता
वित्त अधिनियम, 2017 – अध्याय XIV, धारा 184
Tribunal, Appellate Tribunal and Other Authorities Rules, 2017
बहुमत का निर्णय (मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एन वी रमण और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना):
बहुमत ने यह पाया कि मनी बिल की वैधता, विशेषतः अनुच्छेद 110(1) में निहित शब्द ‘only’ की व्याख्या के आलोक में, गंभीर संवैधानिक व्याख्या की मांग करती है। अतः, इस प्रश्न को सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ को भेजने का निर्देश दिया गया।
धारा 184 के संदर्भ में बहुमत ने माना कि यह धारा स्वयं में अत्यधिक विनियोजन का दोष नहीं रखती, क्योंकि विधायिका ने कुछ सीमाएं व नीति मार्गदर्शक तत्त्व पूर्ववर्ती निर्णयों में निर्धारित कर रखे हैं (जैसे R.K. Jain, L. Chandra Kumar, R. Gandhi, Madras Bar Association)। परंतु, कार्यपालिका द्वारा बनाए गए Tribunal Rules, 2017 न्यायिक स्वतंत्रता की संवैधानिक आवश्यकताओं को ठेस पहुंचाते हैं और न्यायालय के पूर्व निर्णयों के विपरीत हैं। इसलिए इन नियमों को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया गया।
न्यायमूर्ति डॉ डी वाई चंद्रचूड़ का समविचारित लेकिन पृथक अभिमत:
उन्होंने स्पष्ट किया कि Part XIV को मनी बिल के रूप में पारित करना संविधान की अवमानना है। न्यायिक स्वतंत्रता, न्यायाधिकरणों की संरचना, नियुक्ति प्रक्रिया व सेवा शर्तों पर कार्यपालिका के नियंत्रण को उन्होंने संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन माना। उनके अनुसार, नियमों में न्यायपालिका की भागीदारी अत्यंत सीमित कर दी गई थी, जिससे न्यायिक निष्पक्षता प्रभावित होती है।
न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता का आंशिक असहमति मत:
उन्होंने धारा 184 को भी असंवैधानिक ठहराया और माना कि विधायिका ने न्यायिक निर्देशों की अवहेलना की है। उनके अनुसार, विधायी और कार्यकारी दोनों ही संस्थाओं ने न्यायालय के पूर्व निर्णयों को लागू करने का गंभीर प्रयास नहीं किया। उन्होंने एक एकीकृत न्यायाधिकरण निगरानी निकाय की स्थापना और न्यायिक प्रभाव मूल्यांकन (Judicial Impact Assessment) की सिफारिश की।
न्यायालय के आदेशों का सारांश:
- मनी बिल की वैधता का प्रश्न सात-सदस्यीय संविधान पीठ को सौंपा गया।
- धारा 184 वैध मानी गई, लेकिन उसके अधीन बने Tribunal Rules, 2017 को पूर्णतः असंवैधानिक घोषित किया गया।
- केंद्र सरकार को निर्देश – नए नियम न्यायिक स्वतंत्रता, पूर्व निर्णयों, और संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप बनाए जाएं।
- राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunals Commission) की सिफारिश – जो नियुक्ति, सेवा शर्त, वित्तीय प्रबंधन आदि की निगरानी करे।
- Judicial Impact Assessment के आदेश – सभी न्यायाधिकरणों की कार्यात्मक और वित्तीय प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया जाए।
- सीधे सुप्रीम कोर्ट अपीलों की समीक्षा – High Court को प्राथमिक अपीली मंच बनाए रखने पर विचार किया जाए।
यह निर्णय भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में न्यायिक स्वतंत्रता, कार्यपालिका पर नियंत्रण की सीमा, और न्यायाधिकरणों की स्वायत्तता की रक्षा हेतु एक ऐतिहासिक प्राधिकरण स्थापित करता है। इससे न केवल विधायी प्रक्रिया की परख होती है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे की दृढ़ता का पुनः पुष्टि करता है।