बिना लाइसेंस फैक्ट्री संचालन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कपड़े धोने की इकाई भी फैक्ट्री मानी गई

भारतीय कानून

The State of Goa & Anr. v. Namita Tripathi
[2025] 3 S.C.R. 341

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि कोई परिसर विद्युत शक्ति की सहायता से चलाया जा रहा हो और उसमें नौ से अधिक श्रमिक कार्यरत हों, तो वह स्थान ‘फैक्ट्री’ की कानूनी परिभाषा में आएगा, भले ही वह केवल कपड़े धोने का कार्य ही क्यों न कर रहा हो। यह निर्णय फैक्ट्रीज अधिनियम, 1948 की धारा 2(k) (उत्पादन प्रक्रिया की परिभाषा), 2(m) (फैक्ट्री की परिभाषा), धारा 92 तथा गोवा फैक्ट्री नियमावली, 1985 के नियम 3, 4 और 6 की व्याख्या करते हुए दिया गया।

मामले में उत्तरदाता पर यह आरोप था कि उसने गोवा राज्य में एक कपड़े धोने की व्यावसायिक इकाई बिना लाइसेंस के संचालित की, जहाँ विद्युत उपकरणों के माध्यम से 9 से अधिक श्रमिक कार्यरत थे। प्रारंभिक कार्यवाही में मजिस्ट्रेट द्वारा 4 दिसंबर 2019 को समन जारी किया गया था, जिसे उत्तरदाता ने चुनौती दी थी और कार्यवाही रद्द करवा दी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के निर्णय को पलटते हुए कहा कि ‘कपड़े धोना’ भी फैक्ट्रीज अधिनियम की धारा 2(k) के तहत “उत्पादन प्रक्रिया” माना जाएगा, विशेषकर जब यह व्यवस्थित रूप से वाणिज्यिक उद्देश्य से किया जा रहा हो और उसमें विद्युत शक्ति तथा श्रमिकों की सहायता ली जा रही हो। इस प्रकार का कार्य फैक्ट्री की परिभाषा के अंतर्गत आता है और इसके लिए विधिवत लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य होता है।

अदालत ने यह भी कहा कि गोवा फैक्ट्री नियमावली के नियम 3, 4 और 6 में स्पष्ट प्रावधान हैं जिनके तहत किसी भी परिसर को फैक्ट्री के रूप में संचालन से पहले पंजीकरण और लाइसेंस प्राप्त करना आवश्यक है। इन प्रावधानों की अनदेखी करना गंभीर उल्लंघन है और इसके लिए दंडात्मक कार्यवाही की जा सकती है।

इन कानूनी तथ्यों के आलोक में सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर 2019 को जारी समन को पुनः वैध ठहराया और शिकायत की कार्यवाही को बहाल कर दिया। यह निर्णय फैक्ट्रीज अधिनियम के अनुपालन की अनिवार्यता को दोहराता है और स्पष्ट करता है कि व्यावसायिक स्थलों को लाइसेंस और पंजीकरण की प्रक्रिया से छूट नहीं दी जा सकती, चाहे उनकी गतिविधि कितनी भी सामान्य क्यों न प्रतीत हो।

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