निजी अस्पतालों में मनमाने शुल्क और रोगियों के शोषण की समस्या

भारतीय कानून

SIDDHARTH DALMIA एवं अन्य बनाम UNION OF INDIA एवं अन्य

SCR उद्धरण: [2025] 4 S.C.R. 197

निर्णय दिनांक: 04 मार्च 2025

न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति सूर्यकांत

प्रकरण प्रकार: रिट याचिका (सिविल) /337/2018

निर्णय: याचिका का निपटारा

न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 351

भारतीय संविधान – भाग IV; सातवीं अनुसूची, सूची-II –

निजी अस्पतालों में मनमाने शुल्क और रोगियों के शोषण की समस्या – न्यायालय द्वारा अनिवार्य दिशा-निर्देश देना उचित नहीं – राज्य सरकारों को संवेदनशील बनाना आवश्यक – सभी राज्य सरकारों को उपयुक्त नीतिगत निर्णय लेने हेतु निर्देश।

निर्णय:

राज्य सरकारों ने संविधान के भाग IV में निहित कर्तव्य और दृष्टिकोण के अंतर्गत नागरिकों को चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने की प्रतिबद्धता जताई है। परंतु देश की जनसंख्या की तुलना में राज्यों द्वारा समुचित चिकित्सा ढांचा विकसित नहीं किया जा सका है।

अतः राज्यों ने निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करवाया है। आज न केवल नागरिक बल्कि स्वयं राज्य सरकारें भी इन निजी अस्पतालों पर सामान्य एवं विशिष्ट चिकित्सा सुविधाओं के लिए निर्भर हैं।

सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता, अस्पताल एवं औषधालय विषय अनुसूची VII की सूची-II (राज्य सूची) में आता है, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोई अनिवार्य निर्देश देना उचित नहीं होगा, जो निजी क्षेत्र के अस्पतालों के विकास में बाधा बन सके।

साथ ही, यह आवश्यक है कि राज्य सरकारें निजी अस्पतालों में अवांछनीय शुल्क और रोगी शोषण की समस्याओं को गंभीरता से लें।

निष्कर्षतः, यह रिट याचिका इस निर्देश के साथ निपटाई गई कि सभी राज्य सरकारें इस मुद्दे पर विचार करें और उपयुक्त नीतिगत निर्णय लें।

संविधान का अनुच्छेद 21 – जीवन का अधिकार – सभी के लिए चिकित्सा सुविधा का प्रावधान, जीवन के अधिकार का अनिवार्य अंग है।

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