मोटर यान अधिनियम, 1988 – मोटर दुर्घटना – मुआवज़ा – मुआवज़े की राशि सीधे दावाकर्ता के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाए

विधि विशेष

PARMINDER SINGH बनाम HONEY GOYAL AND OTHERS

SCR उद्धरण: [2025] 4 S.C.R. 50

निर्णय दिनांक: 18 मार्च 2025

न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति राजेश बिंदल

प्रकरण प्रकार: सिविल अपील /4299/2025

निर्णय: अपील स्वीकार

न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 361

मोटर यान अधिनियम, 1988 – मोटर दुर्घटना – मुआवज़ा – वृद्धि –

अपीलकर्ता, आयु 21 वर्ष, पशु चिकित्सा का छात्र तथा राज्य स्तरीय वॉलीबॉल खिलाड़ी, एक कार की टक्कर से ग्रसित हुआ, जिससे चारों अंगों में पक्षाघात (quadriplegia) हो गया और उसे 100% दिव्यांग घोषित किया गया। दावा याचिका के आधार पर अधिकरण ने ₹5,16,000/- मुआवज़ा प्रदान किया। उच्च न्यायालय ने इसे बढ़ाकर ₹15,25,600/- किया।

निर्णय:

अपीलकर्ता की आय कम मानी गई थी, जबकि वह एक कुशल खिलाड़ी और तकनीकी योग्यता वाला छात्र था। ₹5,600/- प्रतिमाह आय निर्धारण न्यूनतम मजदूरी से भी कम था। अतः न्यायालय ने ₹7,500/- प्रतिमाह मानकर आय निर्धारित की।

भविष्य की आय वृद्धि (future prospects) को लेकर उच्च न्यायालय द्वारा कोई लाभ नहीं दिया गया, जबकि यह 40% होना चाहिए था। इस आधार पर कुल आय ₹10,500/- (₹7,500 x 1.4) प्रतिमाह मानी गई।

इसके साथ ही न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि अपीलकर्ता को दीर्घकालीन फिजियोथेरेपी की आवश्यकता होगी। अतः कुल ₹36,84,000/- मुआवज़ा आय की हानि, चिकित्सकीय व्यय, परिचर शुल्क, विशेष आहार, शारीरिक पीड़ा, फिजियोथेरेपी, भविष्य की चिकित्सा और विवाह की संभावना के नुकसान जैसे मदों में निर्धारित किया गया।

विवादित आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया गया तथा निर्देश दिया गया कि बढ़ी हुई राशि बीमा कंपनी द्वारा अपीलकर्ता के बैंक खाते में निर्दिष्ट समय-सीमा के भीतर जमा की जाए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्देश – मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवज़ा भुगतान की विधि –

मुआवज़ा जमा करने को लेकर कोई एकरूप प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती – कभी यह सरकारी कोष में रहता है, कभी इसे ब्याज सहित सावधि जमा में रखा जाता है।

बीमा कंपनियां प्रायः राशि अधिकरण के समक्ष जमा करती हैं, जिससे न्यायालयीय प्रक्रिया में विलंब होता है।

अब सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मुआवज़े की राशि सीधे दावाकर्ता के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाए और इसकी सूचना अधिकरण को दी जाए।

प्रारंभिक चरण में ही दावाकर्ता से बैंक विवरण प्रस्तुत करवाया जाए; यदि खाता न हो तो खुलवाया जाए। नाबालिग दावाकर्ता के लिए अभिभावक (परिवारजन) के माध्यम से खाता खोला जाए।

यदि अधिकरण निर्देश दे कि कोई प्रतिशत राशि सावधि जमा में रखी जाए, तो वह पुरस्कार आदेश में ही उल्लेखित किया जा सकता है और बैंक द्वारा उसका पालन किया जाएगा। इस व्यवस्था से न्यायहित में बनी मुआवज़ा प्रणाली का उद्देश्य, पीड़ित व्यक्ति को शीघ्र मुआवज़ा उपलब्ध कराना, सरलता से पूरा हो सकेगा। यह प्रक्रिया अन्य मामलों में भी न्यायालयों/अधिकरणों द्वारा अपनाई जा सकती है।

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