Kantaru Rajeevaru बनाम Indian Young Lawyers Association व अन्य
(Review Petition (Civil) No. 3358/2018 in WP (C) No. 373/2006)
मुख्य मुद्दे (Substantial Issues):
- क्या 10-50 वर्ष की महिलाओं का मंदिर प्रवेश वर्जन एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है?
- क्या यह प्रतिबंध अनुच्छेद 25(1) में प्रदत्त समान धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करता है?
- क्या न्यायालयों को धार्मिक प्रथाओं की “आवश्यकता” का निर्धारण करने का अधिकार है?
- क्या यह मामला अन्य धर्मों में महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों से जुड़ा हुआ है (जैसे दर्गाह, पारसी अग्यारी आदि)?
- क्या पुनर्विचार याचिकाओं में कोई स्पष्ट त्रुटि या निवारण योग्य बिंदु है?
प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान (Relevant Constitutional Provisions):
अनुच्छेद 25(1): सभी व्यक्तियों को समान रूप से धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 26: धार्मिक सम्प्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन
अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार
अनुच्छेद 137: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों की पुनर्विचार याचिका
अनुच्छेद 145(3): संवैधानिक व्याख्या वाले मामलों में न्यूनतम 5 न्यायाधीशों की पीठ अनिवार्य
केरल सार्वजनिक उपासना स्थल (प्रवेश का प्राधिकरण) अधिनियम, 1965 – धारा 3
1965 नियमावली – नियम 3(b) – महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध
न्यायालय का निर्णय (Court’s Holding):
बहुमत मत (Majority View) – न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, ए.एम. खानविलकर, इन्दु मल्होत्रा:
सबरीमला विवाद अन्य प्रथाओं जैसे मुस्लिम महिलाओं का दर्गाह में प्रवेश, पारसी महिलाओं का अग्यारी में प्रवेश, और दाऊदी बोहरा समुदाय में female genital mutilation जैसे मामलों से जुड़ा हुआ है।
इन सभी मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25 व 26) और समानता (अनुच्छेद 14) के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता है।
अतः यह निर्णय एक 7-न्यायाधीशों की विस्तारित संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए जो सभी मुद्दों का निपटारा एकसाथ करे।
पुनर्विचार याचिकाएं और नए रिट याचिकाएं तब तक लंबित रहेंगी।
अल्पमत मत (Minority/Dissenting View) – न्यायमूर्ति आर.एफ. नरिमन और डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़:
पुनर्विचार याचिकाएं केवल 2018 के निर्णय की समीक्षा तक सीमित हैं। अन्य धर्मों के मुद्दों को इस समीक्षा का आधार नहीं बनाया जा सकता।
2018 के चार बहुमत निर्णयों में स्पष्ट रूप से घोषित किया गया कि:
- अयप्पा भक्त कोई स्वतंत्र “धार्मिक सम्प्रदाय” नहीं हैं।
- महिलाओं का बहिष्कार अनुच्छेद 25(1) का उल्लंघन है।
- धारा 3, 1965 अधिनियम और नियम 3(b) असंवैधानिक हैं।
इस प्रकार, पुनर्विचार के लिए कोई स्पष्ट या मौलिक त्रुटि प्रदर्शित नहीं हुई है।
सभी पुनर्विचार और नई याचिकाएं खारिज कर दी गईं।
यह निर्णय भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता बनाम लैंगिक समानता के टकराव का प्रमुख उदाहरण है। बहुमत ने मामला बड़ी पीठ को भेजने का आदेश दिया ताकि अन्य संबंधित मुद्दों (दर्गाह, अग्यारी, महिला खतना) पर भी एकरूप दृष्टिकोण विकसित किया जा सके। वहीं, अल्पमत ने पुनर्विचार को अस्वीकार करते हुए 2018 के फैसले को ही अंतिम माना।