बैंक राष्ट्रीयकरण मामला

भारतीय कानून

RUSTOM CAVASJEE COOPER v. UNION OF INDIA

February 10, 1970

इस ऐतिहासिक फैसले को “बैंक राष्ट्रीयकरण मामला” (Bank Nationalization Case) भी कहा जाता है। इसमें Banking Companies (Acquisition and Transfer of Undertakings) Act, 1969 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके माध्यम से भारत सरकार ने 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। याचिकाकर्ता रुस्तम कूपर, एक बैंक के शेयरधारक और निदेशक थे, जिन्होंने अनुच्छेद 14, 19 और 31 के तहत अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर इस अधिनियम और पहले जारी अध्यादेश को चुनौती दी थी।
मुख्य मुद्दे:
क्या राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करना वैध था?
क्या यह अधिनियम संसद के विधायी अधिकार क्षेत्र के भीतर था?
क्या याचिकाकर्ता को याचिका दायर करने का लोकस स्टैंडी (अधिकार) था?
क्या अधिनियम अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(f) और (g) (संपत्ति और व्यापार का अधिकार), और 31(2) (मुआवजे के साथ संपत्ति अधिग्रहण) का उल्लंघन करता है?
क्या अधिनियम के तहत निर्धारित मुआवजे की विधि उचित और संवैधानिक थी?
क्या अनुच्छेद 19(1)(f) और 31(2) परस्पर अनन्य हैं?
क्या अधिग्रहण और बैंकों पर लगाए गए प्रतिबंध भेदभावपूर्ण और अनुचित थे?
न्यायालय का निर्णय:
बहुमत का मत (मुख्य न्यायाधीश शाह एवं अन्य):
याचिकाएं स्वीकार्य थीं क्योंकि याचिकाकर्ता का स्वयं का मौलिक अधिकार प्रभावित हुआ था।
अनुच्छेद 123 के अंतर्गत अध्यादेश की वैधता न्यायिक समीक्षा के अधीन है। हालांकि राष्ट्रपति की “संतुष्टि” की सीमा पर अंतिम राय नहीं दी गई।
अधिनियम अनुच्छेद 31(2) का उल्लंघन करता है क्योंकि मुआवजा तय करने की विधि प्रासंगिक सिद्धांतों पर आधारित नहीं थी, और इसमें गुडविल जैसे महत्वपूर्ण घटक शामिल नहीं थे।
अनुच्छेद 19(1)(f) और 31(2) एक-दूसरे के पूरक हैं और कोई कानून यदि संपत्ति के अधिकार पर असर डालता है, तो उसे अनुच्छेद 19 की कसौटी पर भी परखा जा सकता है।
अधिनियम ने बैंकों को उनका व्यवसाय करने से वास्तविक रूप से वंचित कर दिया, जिससे यह अनुच्छेद 14 और 19 का उल्लंघन करता है।
अनुच्छेद 15(2) के तहत जो प्रावधान थे, वह भेदभावपूर्ण और अनुचित प्रतिबंध लगाते थे।
अनुच्छेद 31(2) के तहत प्रासंगिक मुआवजा सिद्धांतों की कमी के कारण पूरा अधिनियम असंवैधानिक घोषित किया गया।
अल्पमत का मत (न्यायमूर्ति ए.एन. रे):
उन्होंने अध्यादेश और अधिनियम को वैध माना।
कहा गया कि अनुच्छेद 31(2) के तहत “मुआवजा” का अर्थ “उचित प्रतिकर” (just equivalent) नहीं है; पर्याप्तता की न्यायिक समीक्षा संभव नहीं।
राज्य द्वारा एकाधिकार स्थापित करना अनुच्छेद 19(6)(ii) के तहत वैध है।
14 बैंकों का चयन उचित वर्गीकरण (intelligible differentia) पर आधारित था।
अधिग्रहण “सार्वजनिक उद्देश्य” के लिए किया गया था और यह संवैधानिक रूप से उचित था।
स्थापित संवैधानिक सिद्धांत:
मौलिक अधिकारों का अंतःसंबंध: अनुच्छेद 19 और 31 परस्पर पूरक हैं, और संपत्ति अधिग्रहण का कानून अन्य मौलिक अधिकारों की कसौटी पर भी परखा जा सकता है।
मुआवजा की वैधता: अनुच्छेद 31(2) के तहत मुआवजा प्रासंगिक सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए, भले ही पर्याप्तता को चुनौती नहीं दी जा सकती।
अनुच्छेद 14 की कसौटी: अधिग्रहण या प्रतिबंध यदि मनमाना या असमान है, तो उसे अनुच्छेद 14 के अंतर्गत चुनौती दी जा सकती है।
कानून का रूप नहीं, बल्कि प्रभाव देखा जाएगा: यह देखा जाएगा कि कानून का सीधा प्रभाव व्यक्ति के अधिकारों पर क्या है, केवल उद्देश्यों के आधार पर नहीं।

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