प्रिवी पर्स की गारंटी

न्यायिक निर्णय

H. H. MAHARAJADIDRAJA MADHAV RAO JIWAJI RAO SCINDIA BAHADUR & ORS. .v/s UNION OF INDIA

December 15, 1970

यह मामला तब उत्पन्न हुआ जब भारत के राष्ट्रपति ने, संविधान के 24वें संशोधन विधेयक (1970) के राज्यसभा में विफल होने के पश्चात, एक आदेश जारी कर भारत के सभी पूर्व रियासतों के शासकों की मान्यता को समाप्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं में माधवराव सिंधिया सहित कई पूर्व शासक थे, जिन्होंने इस आदेश को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत चुनौती दी।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह आदेश संविधान के अनुच्छेद 291 (जो प्रिवी पर्स की गारंटी देता है) और अनुच्छेद 362 (जो शासकों के अधिकारों, विशेषाधिकारों और गरिमाओं की रक्षा करता है) का उल्लंघन है। साथ ही, यह आदेश अनुच्छेद 19(1)(f), 21 और 31 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है।

विवाद के मुख्य प्रश्न:
क्या राष्ट्रपति को अनुच्छेद 366(22) के तहत शासकों की मान्यता समाप्त करने का अधिकार है?

क्या प्रिवी पर्स की समाप्ति, अनुच्छेद 291 और 362 का उल्लंघन है?

क्या अनुच्छेद 363 के तहत यह विवाद न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है?

क्या प्रिवी पर्स “संपत्ति” है, और क्या इसे समाप्त करना अनुच्छेद 31 का उल्लंघन है?

क्या राष्ट्रपति की कार्रवाई “राजनीतिक” (Act of State) है या यह न्यायिक समीक्षा के अधीन है?

न्यायालय का निर्णय:
बहुमत का मत (मुख्य न्यायाधीश हिदायतुल्लाह एवं अन्य):
राष्ट्रपति द्वारा शासकों की मान्यता समाप्त करने का आदेश संविधान के विरुद्ध और अवैध है।

अनुच्छेद 366(22) केवल शासक की परिभाषा देता है, यह राष्ट्रपति को सामूहिक रूप से सभी शासकों की मान्यता समाप्त करने का अधिकार नहीं देता।

“for the time being” वाक्यांश का अर्थ यह नहीं कि कोई भी व्यक्ति बिना उत्तराधिकार के नियुक्त किया जा सकता है।

प्रिवी पर्स संपत्ति है, और उसे समाप्त करना अनुच्छेद 19(1)(f) और 31 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

अनुच्छेद 291 के तहत प्रिवी पर्स का भुगतान संवैधानिक दायित्व है, केवल राजनीतिक वादा नहीं।

अनुच्छेद 363 न्यायालय के क्षेत्राधिकार को इस मामले में प्रतिबंधित नहीं करता, क्योंकि विवाद संविधान के प्रावधानों से उत्पन्न हुआ, न कि केवल संधियों या अनुबंधों से।

राष्ट्रपति की कार्रवाई “राजनीतिक शक्ति” या “अधिनियम राज्य” के रूप में न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं है।

अल्पमत का मत (न्यायमूर्ति मित्तेर एवं रे):
यह विवाद अनुच्छेद 363 के अंतर्गत आता है और इसलिए न्यायालय में विचारणीय नहीं है।

प्रिवी पर्स केवल राजनीतिक व्यवस्था थी, और यह कानूनी रूप से प्रवर्तनीय अधिकार नहीं था।

अनुच्छेद 291 केवल राजनीतिक वादे की संवैधानिक मान्यता है, न कि स्वतंत्र रूप से प्रवर्तनीय अधिकार।

शासक की मान्यता देना या समाप्त करना राष्ट्रपति की राजनीतिक शक्ति है, जो न्यायिक समीक्षा से बाहर है।

निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से यह निर्णय दिया कि:

राष्ट्रपति द्वारा शासकों की मान्यता समाप्त करना असंवैधानिक और अवैध था।

प्रिवी पर्स एक कानूनी अधिकार था, केवल राजनीतिक पेंशन नहीं।

अनुच्छेद 363 के तहत न्यायालय का अधिकार क्षेत्र इस मामले में सीमित नहीं है।

यह निर्णय ऐतिहासिक रहा जिसने यह सिद्ध किया कि संवैधानिक गारंटियाँ, चाहे उनका आधार ऐतिहासिक संधियाँ ही क्यों न हों, न्यायिक समीक्षा के अधीन और विधिसम्मत रूप से प्रवर्तनीय हैं।

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