निजी और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संवैधानिक अधिकार

मामले एवं विश्लेषण

T.M.A. Pai Foundation & Others v. State of Karnataka & Others, [(2002) 8 SCC 481] – Constitution Bench Judgment decided on October 31, 2002

टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य, [(2002) 8 SCC 481] – यह संविधान पीठ का निर्णय है, जो 31 अक्टूबर 2002 को पारित किया गया।

सारांश:
यह ऐतिहासिक 11-न्यायाधीशों की पीठ का निर्णय था, जिसमें यह तय किया गया कि अनुच्छेद 19(1)(g), 26, 29(2), और 30(1) के अंतर्गत निजी और अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संवैधानिक अधिकार क्या हैं। इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित निजी (अनुदानित और अनानुदानित) संस्थानों को कितना प्रशासनिक स्वायत्तता प्राप्त है, और राज्य की भूमिका विनियमन, सहायता, प्रवेश प्रक्रिया और प्रबंधन में किस सीमा तक हो सकती है।

मुख्य मुद्दे:
क्या शैक्षणिक संस्थान स्थापित और संचालित करने का मौलिक अधिकार है?

हां, सभी नागरिकों को यह अधिकार अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 26 के तहत प्राप्त है, जबकि अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 30(1) के तहत विशेष संरक्षण प्राप्त है।

क्या अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यक संस्थानों को पूर्ण स्वायत्तता देता है?

नहीं, यह अधिकार पूर्ण नहीं है। यदि संस्थान सरकारी सहायता प्राप्त करता है, तो शैक्षणिक गुणवत्ता सुनिश्चित करने, पारदर्शी प्रवेश, और दुरुपयोग से बचाव हेतु यथोचित नियम लागू किए जा सकते हैं।

क्या अनुच्छेद 29(2) उन अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू होता है जो राज्य से सहायता प्राप्त करते हैं?

हां, यदि कोई अल्पसंख्यक संस्थान सरकारी सहायता प्राप्त करता है, तो वह केवल धर्म, जाति, नस्ल, भाषा आदि के आधार पर किसी नागरिक को प्रवेश से वंचित नहीं कर सकता। योग्यता के आधार पर उचित सीमा में गैर-अल्पसंख्यक छात्रों को प्रवेश देना आवश्यक है।

सरकारी नियंत्रण की सीमा अनुदानित बनाम अनानुदानित संस्थानों पर क्या होगी?

अनानुदानित संस्थानों को प्रशासन, शुल्क संरचना, प्रवेश और स्टाफ चयन में अधिक स्वायत्तता प्राप्त है।

अनुदानित संस्थानों पर प्रवेश प्रक्रिया, स्टाफ नियुक्ति और निधियों के उपयोग संबंधी अधिक कड़े सरकारी नियम लागू हो सकते हैं, लेकिन उन्हें सरकारी संस्थान की तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता।

क्या धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर होगी या पूरे देश के स्तर पर?

राज्य को इकाई माना जाएगा। अर्थात्, अल्पसंख्यक की पहचान राज्यवार की जाएगी।

क्या उनिकृष्णन केस (1993) अब भी मान्य है?

आंशिक रूप से निष्प्रभावी। अदालत ने यह माना कि “फ्री और पेमेंट सीट” जैसी प्रवेश योजना और शुल्क की सीमा तय करना संवैधानिक रूप से असंवैधानिक है, हालांकि प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार मानने का सिद्धांत मान्य रखा गया।

अदालत ने क्या निर्णय दिया:
अल्पसंख्यक अधिकार: अल्पसंख्यक संस्थान अपने समुदाय के छात्रों को प्रवेश दे सकते हैं, परंतु व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में योग्यता आधारित प्रवेश भी जरूरी है।

अनानुदानित संस्थान: ये संस्थान अपना शुल्क स्वयं निर्धारित कर सकते हैं, स्टाफ नियुक्त कर सकते हैं, और पारदर्शी प्रक्रिया से छात्रों को प्रवेश दे सकते हैं।

अनुदानित संस्थान: इन्हें सरकार के नियमों का पालन करना होगा, और योग्यता के आधार पर छात्रों को प्रवेश देना होगा।

अनुच्छेद 30 बनाम अनुच्छेद 29(2): अनुच्छेद 30(1) के अधिकार अनुच्छेद 29(2) से बाधित हो सकते हैं जब संस्थान राज्य से सहायता प्राप्त करता है।

पूर्ण छूट नहीं: अल्पसंख्यक संस्थान भी स्वास्थ्य, नैतिकता, शिक्षा की गुणवत्ता और सार्वजनिक व्यवस्था जैसे कानूनों के अधीन हैं।

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