सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद की संविधान संशोधन शक्ति की सीमाओं को स्पष्ट किया

विधिक समाचार

His Holiness Kesavananda Bharati Sripadagalavaru v. State of Kerala, decided on April 24, 1973, by a 13-judge Constitution Bench

इस ऐतिहासिक निर्णय में, सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद की संविधान संशोधन शक्ति की सीमाओं को स्पष्ट किया। यह मामला संविधान के 24वें, 25वें और 29वें संशोधन की वैधता को चुनौती देने से उत्पन्न हुआ, जिन्होंने मौलिक अधिकारों और संपत्ति के अधिकार को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया था।

अधिकांश न्यायाधीशों का मत था कि संसद को संविधान, जिसमें मौलिक अधिकार भी सम्मिलित हैं, संशोधित करने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, परंतु वह संविधान की “मूल संरचना” को परिवर्तित नहीं कर सकती। इस निर्णय के माध्यम से “मूल संरचना सिद्धांत” की स्थापना हुई, जो भारतीय संविधान का एक अद्वितीय सैद्धांतिक आधार है।

मुख्य मुद्दे:

क्या संसद संविधान के किसी भी भाग को, जिसमें मौलिक अधिकार भी शामिल हैं, संशोधित कर सकती है?
निर्णय: संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है, लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है।

क्या अनुच्छेद 13(2) में प्रयुक्त “कानून” शब्द में संविधान संशोधन भी शामिल है?
निर्णय: गोलकनाथ निर्णय को खारिज कर दिया गया। यह कहा गया कि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13(2) के अंतर्गत “कानून” नहीं है, इसलिए उसे इस आधार पर निरस्त नहीं किया जा सकता।

क्या संसद संविधान की “मूल संरचना” को संशोधन के माध्यम से समाप्त या नष्ट कर सकती है?
नहीं। संशोधन की शक्ति में संविधान की मौलिक विशेषताओं (जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, शक्तियों का पृथक्करण आदि) को नष्ट करने या परिवर्तित करने की शक्ति शामिल नहीं है।

24वां, 25वां और 29वां संशोधन:

  • 24वां संशोधन: वैध – संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है।
  • 25वां संशोधन:
    • धारा 2 (‘मुआवजा’ के स्थान पर ‘राशि’): वैध
    • धारा 3 (अनुच्छेद 31C – न्यायिक पुनरवलोकन से छूट): आंशिक रूप से अमान्य – न्यायालय की समीक्षा शक्ति बनी रहती है।
  • 29वां संशोधन: वैध, लेकिन यदि किसी कानून द्वारा मौलिक अधिकारों को समाप्त किया जाता है, तो वह संरक्षण अप्रभावी होगा।

स्थापित सिद्धांत: मूल संरचना सिद्धांत

संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, परंतु वह उसकी मूल संरचना या ढांचे को नष्ट या परिवर्तित नहीं कर सकती। इस मूल संरचना में सम्मिलित हैं:

  • संविधान की सर्वोच्चता
  • गणराज्य और लोकतांत्रिक शासन प्रणाली
  • धर्मनिरपेक्षता
  • विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्तियों का पृथक्करण
  • संघीय ढांचा
  • व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता
  • न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *