न्यायिक निष्पक्षता और पुनर्विचार में न्यायाधीश की पुनः भागीदारी की वैधता पर संविधान पीठ का निर्णय

विधिक समाचार

INDORE DEVELOPMENT AUTHORITY v. MANOHAR LAL & ORS. ETC.[2019] 15 SCR 1085 | Special Leave Petition (C) Nos. 9036–9038 of 2016
इस वाद में प्रमुख मुद्दा यह था कि क्या कोई न्यायाधीश, जिसने पहले किसी छोटे पीठ में किसी विधिक प्रश्न पर निर्णय दिया हो, वह उस ही मामले में उस निर्णय की पुनर्समीक्षा हेतु गठित बड़ी संविधान पीठ का हिस्सा बन सकता है या नहीं। यह मुद्दा उस स्थिति में उत्पन्न हुआ जब न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, जिन्होंने पूर्व में Indore Development Authority v. Shailendra [(2018) SCC Online SC 100] में भूमि अधिग्रहण से संबंधित धारा 24, 2013 के अधिनियम की व्याख्या की थी, पुनः पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में नियुक्त किए गए।

प्रमुख मुद्दे:
क्या एक न्यायाधीश, जिसने पहले किसी छोटे पीठ में कोई विधिक निर्णय दिया है, उस ही विषय पर पुनः विचार के लिए गठित बड़ी पीठ का सदस्य बन सकता है?
क्या पूर्व में दिए गए निर्णय को आधार बनाकर पक्षकार न्यायाधीश की निष्पक्षता पर प्रश्न उठा सकता है?

बहुमत का निर्णय:
न्यायालय ने यह घोषित किया कि एक न्यायाधीश का पूर्व में दिए गए निर्णय के कारण संविधान पीठ से स्वेच्छा से हटना आवश्यक नहीं है। न्यायिक निर्णयों की पुनः समीक्षा एवं पुनर्विचार की प्रणाली में वही न्यायाधीश, जिन्होंने पूर्व में निर्णय दिया है, संविधान पीठ में भाग लेने के लिए बाधित नहीं माने जाते। यह एक दीर्घकालिक व्यवहारिक परंपरा है जो न्यायालयों में सामान्य रूप से स्वीकार की जाती है।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति इंदिरा बैनर्जी, न्यायमूर्ति एम आर शाह, न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति एस रवीन्द्र भट द्वारा सुनाया गया बहुमत का निर्णय इस प्रकार है:
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया कि यदि केवल इस आधार पर न्यायाधीश को हटना पड़े कि उसने किसी पूर्व निर्णय में एक राय दी है, तो यह न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता के लिए घातक सिद्ध होगा। न्यायाधीश को अपने पद की शपथ के अनुसार भय, पक्षपात, मोह या द्वेष के बिना कार्य करना होता है। इसलिए Bench Hunting और Forum Shopping को रोका जाना चाहिए। यदि पक्षकारों को यह अधिकार मिल जाए कि वे अपने अनुसार न्यायाधीश चुन सकें, तो यह न्यायिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा।

प्रासंगिक विधिक प्रावधान:

धारा 24, Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013

धारा 31, Land Acquisition Act, 1894

प्रमुख दृष्टांत (Case Laws Discussed):

Pune Municipal Corporation v. Harakchand Misirimal Solanki [(2014) 3 SCC 183]

Yogesh Neema v. State of Madhya Pradesh [(2016) 6 SCC 387]

Bengal Immunity Co. v. State of Bihar [(1955) 2 SCR 603]

Kesavananda Bharati v. State of Kerala [(1973) 4 SCC 225]

M/s. Ujagar Prints v. Union of India [(1989) 3 SCC 488]

Cloth Traders (P) Ltd. v. Addl. CIT [(1979) 3 SCC 538],

Distributors (Baroda) v. Union of India [(1986) 1 SCC 43]

न्यायालय ने कहा कि “Recusal” (पदत्याग) किसी बाह्य प्रभाव के कारण नहीं होना चाहिए, और न ही यह पक्षकार के संदेह पर आधारित हो सकता है। न्यायाधीश का यह दायित्व है कि वह बिना किसी पूर्वाग्रह के कार्य करे, और एक बार जब मुख्य न्यायाधीश द्वारा पीठ का गठन कर दिया जाता है, तो न्यायाधीश को यह स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती कि वह स्वयं चयन करे कि उसे किस पीठ में रहना है।

इस निर्णय ने भारतीय न्याय व्यवस्था में न्यायाधीशों की निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखते हुए यह स्पष्ट किया कि न्यायिक पुनर्विचार में न्यायाधीशों की पूर्व भागीदारी एक बाधा नहीं है। यह निर्णय Bench Hunting और Forum Shopping की प्रवृत्ति के विरुद्ध एक नीतिगत और सुदृढ़ हस्तक्षेप माना गया है।

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