वक्फ संपत्ति विवाद में अत्यधिक विलंबित विशेष अनुमति याचिका की अस्वीकृति

विधि विशेष

Shia Central Board of Waqf, U.P. बनाम Sunni Central Board of Wakf

यह मामला एक अत्यंत पुरानी वक्फ संपत्ति से संबंधित विवाद पर आधारित था, जिसमें Shia Central Board of Waqf, U.P. ने Faizabad सिविल न्यायालय के 30 मार्च 1946 के निर्णय के विरुद्ध वर्ष 2017 में विशेष अनुमति याचिका (Special Leave Petition – SLP) दायर की थी। SLP की डायरी संख्या 22744/2017 थी, जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवम्बर 2019 को खारिज कर दिया।

प्रमुख न्यायिक मुद्दा:
क्या लगभग 68 वर्षों (24964 दिनों) के बाद दायर विशेष अनुमति याचिका को स्वीकार किया जा सकता है, जब तक कि देरी का यथोचित और पर्याप्त स्पष्टीकरण प्रस्तुत न किया गया हो?

बहुमत का निर्णय (न्यायालय का आदेश):
प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, डॉ. डी वाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नज़ीर की खंडपीठ ने यह स्पष्ट किया कि याचिका दायर करने में 24964 दिनों की अत्यधिक देरी की कोई पर्याप्त और संतोषजनक व्याख्या नहीं दी गई थी। अतः, इस विलंब के कारण विशेष अनुमति याचिका को अस्वीकार कर दिया गया।

न्यायालय द्वारा प्रमुख आधार:
न्यायालय ने अपने आदेश में केवल इतना कहा कि “इस विशेष अनुमति याचिका को दायर करने में 24964 दिनों की अत्यधिक देरी है, जिसे पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है। अतः यह याचिका खारिज की जाती है।”

संवैधानिक और विधिक प्रावधानों का उल्लेख:

  • अनुच्छेद 136, भारतीय संविधान: जिसके अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय विशेष अनुमति याचिका सुनता है।
  • प्रक्रिया संहिता: याचिकाओं की स्वीकार्यता से संबंधित सामान्य न्यायिक प्रक्रिया, विशेषतः विलंब में विचार करने के सिद्धांत।

प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांत
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के निर्णयों के अनुसार, यदि विलंब अत्यधिक हो और याचिकाकर्ता कोई संतोषजनक कारण न प्रस्तुत करे, तो याचिका खारिज की जा सकती है (जैसे Collector, Land Acquisition, Anantnag v. Mst. Katiji AIR 1987 SC 1353 में अपवादस्वरूप दृष्टिकोण अपनाया गया था, परंतु यहां मामला अत्यधिक विलंब का था)।

यह मामला न्यायिक प्रक्रिया में delay and laches के सिद्धांत पर आधारित एक महत्वपूर्ण दृष्टांत है, जहां सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि न्यायिक उपायों में अत्यधिक विलंब, बिना पर्याप्त कारण के, न्यायालय की सहानुभूति या विवेक का पात्र नहीं हो सकता। याचिकाकर्ता द्वारा 68 वर्षों बाद दाखिल याचिका, पर्याप्त कारण न होने के कारण, मात्र समय की देरी के आधार पर खारिज कर दी गई।

यह निर्णय न केवल कानून के अनुशासन को बनाए रखने में सहायक है बल्कि यह भी इंगित करता है कि ‘न्याय में विलंब, न्याय से वंचना’ का सिद्धांत केवल पीड़ित के लिए नहीं, बल्कि पूरे न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।

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