Rajnish Singh @ Soni v. State of U.P. and Another
[2025] 3 S.C.R. 303
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि यदि कोई शिक्षित बालिग महिला वर्षों तक सहमति से संबंध बनाए रखती है, तो बाद में विवाह के झूठे वादे के आधार पर लगाए गए बलात्कार जैसे गंभीर आरोपों को स्वतः स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह निर्णय उस मामले में दिया गया जिसमें अभियुक्त पर आरोप था कि उसने विवाह का झूठा वादा कर शिकायतकर्ता के साथ लगभग 16 वर्षों तक यौन संबंध बनाए।
शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी में यह उल्लेख किया था कि अभियुक्त ने उसे विवाह का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाए, किंतु न्यायालय ने पाया कि वह एक शिक्षित और बालिग महिला थी, जो अपने निर्णयों के प्रति पूर्ण रूप से सक्षम थी। वह लगातार 16 वर्षों तक अभियुक्त के साथ संपर्क में रही, स्वयं को उसकी पत्नी बताती रही, और इतने लंबे समय तक मौन रहकर कभी भी कानूनी शिकायत नहीं की।
अदालत ने यह रेखांकित किया कि यदि महिला स्वयं को किसी पुरुष की पत्नी मानकर व्यवहार करती रही हो, और इतने लम्बे समय तक किसी भी प्रकार की आपत्ति या शिकायत दर्ज न की हो, तो इस प्रकार की विलंबित आपराधिक शिकायत को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। न्यायालय ने यह भी कहा कि इस प्रकार के प्रेम संबंधों को आपराधिक प्रकृति प्रदान करने का प्रयास दुरुपयोग की श्रेणी में आता है, विशेषकर तब जब शिकायतकर्ता की सहमति स्वतंत्र और सूचित प्रतीत होती है।
न्यायालय ने आरोपों को विरोधाभासी और अविश्वसनीय माना। उसने यह स्पष्ट किया कि धारा 482 सीआरपीसी के अंतर्गत हस्तक्षेप करना तब न्यायोचित होता है जब शिकायत स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण, द्वेष प्रेरित या तथ्यहीन हो।
इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी व समस्त आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया और यह स्पष्ट किया कि प्रेम संबंध और बलात्कार के आरोपों में स्पष्ट अंतर किया जाना चाहिए। यह निर्णय न केवल अभियुक्त को राहत प्रदान करता है, बल्कि न्यायालय की उस सतर्कता को भी दर्शाता है जिसके तहत वह आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग से व्यक्तियों की प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता की रक्षा करता है।