Suresh v. State Rep. by Inspector of Police
[2025] 3 S.C.R. 317
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि मृत्युकथन (dying declaration) के आधार पर दोषसिद्धि केवल तभी टिकाऊ मानी जा सकती है जब वह सुसंगत, पुष्ट और स्वतंत्र साक्ष्यों द्वारा समर्थित हो। यह मामला एक ऐसी महिला की मृत्यु से जुड़ा था, जिसकी मृत्यु कथित रूप से जलने से हुई थी और अभियोजन ने उसके माता-पिता के बयानों एवं मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज मृत्युकथन पर भरोसा कर अभियुक्त को दोषी ठहरवाया था।
हालाँकि, न्यायालय ने देखा कि मृत्युकथन और मृतका के पूर्व कथनों में स्पष्ट विरोध था। उसके प्रारंभिक बयान अभियोजन की मुख्य थ्योरी से मेल नहीं खाते थे। इसके अतिरिक्त, घटनास्थल पर मिट्टी के तेल की गंध न मिलना, पंचनामे की प्रक्रिया में खामियाँ, और घटनाक्रम की पुष्टि करने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य न मिलना यह दर्शाता है कि मृत्युकथन पर संपूर्ण रूप से भरोसा करना न्यायोचित नहीं होगा।
न्यायालय ने यह माना कि मृत्युकथन एक महत्वपूर्ण साक्ष्य अवश्य है, लेकिन इसे पूरी तरह अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब जब उसमें विरोधाभास हों और अन्य साक्ष्य उसका समर्थन न करते हों। अदालत ने इस सन्दर्भ में Uttam बनाम महाराष्ट्र राज्य (2022) के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि जहां मृत्युकथन संदेहास्पद हो, वहां उसे दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन का कर्तव्य होता है कि वह संदेह से परे जाकर अभियुक्त के अपराध को प्रमाणित करे। यदि परिस्थितियाँ यह संकेत दें कि घटना स्वाभाविक नहीं है या सबूत अधूरे हैं, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। इस मामले में अभियोजन ऐसा करने में असफल रहा।
इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह मानते हुए कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं और मृत्युकथन पर संपूर्ण भरोसा करना संभव नहीं है, अभियुक्त को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय पुनः इस बात को रेखांकित करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में दोषसिद्धि का आधार केवल साक्ष्य की पूर्णता और विश्वसनीयता पर होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक पहलुओं पर।