धारा 138 एन.आई. एक्ट के अंतर्गत मामलों के शीघ्र निपटान की संवैधानिक समीक्षा

मामले एवं विश्लेषण

प्रकरण नाम व वाद संख्या:
In Re: Expeditious Trial of Cases under Section 138 of N.I. Act, 1881
[Suo Motu Writ Petition (Crl.) No. 2 of 2020, (2021) 4 SCC 257]


प्रमुख संवैधानिक / विधिक प्रश्न:
क्या धारा 138 के अंतर्गत अत्यधिक लंबित मामलों के कारण आपराधिक न्याय प्रणाली पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव को दूर करने के लिए विधिक और प्रक्रियात्मक सुधार आवश्यक हैं? क्या न्यायालयों को सम्मन और परीक्षण की प्रक्रिया में लचीलापन और दक्षता बढ़ाने की आवश्यकता है?


बहुमत निर्णय (न्यायाधीश: एस. ए. बोबडे, मुख्य न्यायाधीश; एल. नागेश्वर राव; बी. आर. गवई; ए. एस. बोपन्ना; एस. रविंद्र भट):
न्यायालय ने यह माना कि देश भर में धारा 138 एन.आई. एक्ट के अंतर्गत करोड़ों मामले लंबित हैं, जिनका प्रभाव अन्य आपराधिक मामलों के निपटान पर भी पड़ा है। इस गंभीर स्थिति पर स्वतः संज्ञान लेते हुए न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण निर्देश और सुझाव दिए:

  1. संक्षिप्त से समन्स परीक्षण में रूपांतरण:
    धारा 143 के तहत समरी ट्रायल को समन्स ट्रायल में बदले जाने के लिए कारण रिकॉर्ड करना अनिवार्य होगा। उच्च न्यायालयों को निर्देशित किया गया कि वे मजिस्ट्रेटों के लिए यह व्यवहारिक दिशा-निर्देश जारी करें।
  2. धारा 202 के अंतर्गत जांच:
    जब अभियुक्त न्यायालय की स्थानीय क्षेत्राधिकार से बाहर रहता है, तो प्रक्रिया जारी करने से पूर्व मजिस्ट्रेट द्वारा जांच आवश्यक है। इस जांच में गवाहों के हलफनामे स्वीकार किए जा सकते हैं और केवल दस्तावेजी परीक्षण भी पर्याप्त हो सकता है।
  3. संयुक्त परीक्षण हेतु विधिक संशोधन की आवश्यकता:
    धारा 219 CrPC की सीमा के बावजूद, यदि एक ही उद्देश्य हेतु 12 माह की अवधि में कई चेक जारी किए गए हों, तो एक ही परीक्षण की अनुमति हेतु एन.आई. एक्ट में संशोधन की अनुशंसा की गई।
  4. सम्मन की सेवा का समेकन:
    एक ही लेन-देन से संबंधित मामलों में यदि एक शिकायत में सम्मन की सेवा हो जाती है, तो उस लेन-देन की अन्य शिकायतों में इसे deemed service माना जाए – इसके लिए उच्च न्यायालय व्यवहारिक दिशा-निर्देश दें।
  5. सम्मन वापसी या पुनर्विचार की शक्ति:
    Adalat Prasad v. Rooplal Jindal और Subramanium Sethuraman v. State of Maharashtra के निर्णयों के अनुसार, ट्रायल कोर्ट के पास सम्मन वापस लेने या पुनर्विचार की inherent power नहीं है।
    Meters and Instruments v. Kanchan Mehta का निर्णय इस दृष्टि से गलत विधि घोषित किया गया कि उसने न्यायालयों को इस प्रकार की शक्ति दी।
  6. धारा 258 CrPC का अनुप्रयोग नहीं:
    चूंकि यह प्रावधान केवल वे मामले जिन्हें complaint के अलावा अन्य रूप में आरंभ किया गया हो, पर लागू होता है, इसलिए इसे धारा 138 की शिकायतों पर लागू नहीं किया जा सकता।
  7. धारा 322 CrPC के तहत प्रक्रिया स्थगन:
    यदि मजिस्ट्रेट को पता चले कि उसके पास अधिकार क्षेत्र नहीं है, तो वह कार्यवाही रोककर मामले को उपयुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष भेज सकता है।
  8. मध्यस्थता का प्रयोग:
    न्यायालयों को निर्देश दिया गया कि वे धारा 138 के अंतर्गत लंबित अपीलों और पुनरीक्षणों को मध्यस्थता हेतु भेजें।

प्रमुख विधिक प्रावधानों और निर्णयों का उल्लेख:

  • Negotiable Instruments Act, 1881: Sections 138–147
  • Code of Criminal Procedure, 1973: Sections 202, 219, 220, 258, 322
  • प्रमुख निर्णय:
    • Adalat Prasad v. Rooplal Jindal, (2004) 7 SCC 338
    • Subramanium Sethuraman v. State of Maharashtra, (2004) 13 SCC 324
    • Meters and Instruments Pvt. Ltd. v. Kanchan Mehta, (2018) 1 SCC 560 – गलत विधि घोषित
    • Balbir v. State of Haryana, (2000) 1 SCC 285
    • Vani Agro Enterprises v. State of Gujarat, 2019 (10) SCJ 238
    • State of A.P. v. Cheemalapati Ganeswara Rao, (1964) 3 SCR 297

निष्कर्ष:
सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 138 के मामलों में विलंब को रोकने के लिए कार्यपालिका, न्यायपालिका और RBI समेत सभी संबंधित प्राधिकरणों को शामिल करते हुए व्यापक प्रणालीगत सुधार की पहल की है। विधिक रूप से विशेष रूप से सम्मन सेवा, परीक्षण की प्रकृति, गवाहों के हलफनामे, संयुक्त परीक्षण और पुनर्विचार शक्ति पर स्पष्टता दी गई है। मामले की आगामी सुनवाई तीन न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष होगी और न्यायालय द्वारा गठित समिति इन सुधारों पर आगे की कार्यवाही हेतु विचार करेगी।

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