क्वेटा और कराची में बलोच कार्यकर्ताओं की गैरकानूनी गिरफ्तारी और उत्पीड़न, बलोच समुदाय के अधिकारों पर एक संगठित और खतरनाक हमला दर्शाता है।
पिछले एक हफ्ते में बलोच कार्यकर्ताओं पर जिस तरह से कार्रवाई हुई है और कई प्रदर्शनकारियों व कार्यकर्ताओं – जिनमें माहरांग बलोच, सैम्मी दीन बलोच और बेबरग जहरी शामिल हैं – को अब भी हिरासत में रखा गया है, यह साफ संकेत देता है कि यह बलोच समुदाय के अधिकारों का गला घोंटने की कोशिश है। यह भी सामने आया है कि माहरांग और दिव्यांग बेबरग की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने के बावजूद उन्हें चिकित्सा सहायता नहीं दी जा रही है।
कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग, जैसे मनगढ़ंत एफआईआर और ‘जन व्यवस्था बनाए रखने संबंधी अध्यादेश’ (MPO) के तहत कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करना, यह दर्शाता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को बलोच समुदाय के नागरिक और मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं है।
मांग: सभी बलोच कार्यकर्ताओं को बिना शर्त रिहा किया जाए
सभी बलोच कार्यकर्ताओं को, जो केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का प्रयोग कर रहे थे, तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। साथ ही, 21 मार्च के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के दौरान बल के अवैध प्रयोग की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, दोषियों को सजा मिले और पीड़ितों को न्याय सुनिश्चित किया जाए।
पृष्ठभूमि:
20 मार्च 2025 को, बलोच यकजैती कमेटी (BYC) द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद क्वेटा में बेबरग जहरी और उनके भाई हम्मल जहरी को काउंटर टेररिज़्म डिपार्टमेंट के अधिकारियों ने उनके घर से उठा लिया। इसके विरोध में 21 मार्च को BYC द्वारा किए गए प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा की गई हिंसा में तीन प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई। प्रदर्शन से पहले और बाद में पूरे इलाके में मोबाइल नेटवर्क पूरी तरह बंद कर दिए गए।

BYC की केंद्रीय नेता माहरांग बलोच को 17 अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ 22 मार्च को हिरासत में ले लिया गया। माहरांग और बेबरग को MPO के तहत निरोधात्मक हिरासत में रखा गया है और माहरांग पर अलग से आतंकवाद के आरोप भी लगाए गए हैं।
इसके अलावा, 24 मार्च को कराची में प्रदर्शन के बाद सैम्मी दीन बलोच सहित छह कार्यकर्ताओं को शहर में लगाए गए धारा 144 के उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
निष्कर्ष:
बलोच कार्यकर्ताओं पर इस तरह की दमनकारी कार्रवाई न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह पाकिस्तान के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। इन कार्यकर्ताओं की आवाज़ को दबाना बंद किया जाना चाहिए और उन्हें न्याय मिलना चाहिए।