मामला और संदर्भ
Mohammed Abdul Wahid बनाम निलोफ़र एवं अन्य, (2024) 2 SCC 144
उठाया गया मुख्य संवैधानिक/विधिक प्रश्न
(1) क्या सिविल प्रक्रिया संहिता में “वाद का पक्षकार” (party to a suit) और “साक्षी” (witness) में कोई भिन्नता है?
(2) क्या “वादी या प्रतिवादी का साक्षी” जैसी शब्दावली यह संकेत देती है कि वादी या प्रतिवादी जब स्वयं गवाही देते हैं, तो वे साक्षी नहीं माने जाते?
(3) क्या वाद का कोई पक्षकार जब स्वयं साक्षी के रूप में उपस्थित होता है, तब जिरह हेतु दस्तावेज प्रस्तुत करना Order VII Rule 14, Order VIII Rule 1-A, Order XIII Rule 1 CPC या साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत वर्जित है?
न्यायालय का निर्णय और विधिक सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट और निर्णायक रूप से कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) और साक्ष्य अधिनियम में वाद के पक्षकार और साक्षी में कोई भेद नहीं किया गया है, जब वे गवाही देते हैं।
- जब कोई पक्षकार (Plaintiff/Defendant) स्वयं गवाही देता है, तो वह उसी विधिक प्रक्रिया का पालन करता है जैसा किसी भी अन्य साक्षी के लिए होता है — जिसमें मुख्य परीक्षण (examination-in-chief), जिरह (cross-examination), और पुनः परीक्षण (re-examination) शामिल हैं।
- “Plaintiff’s witness” या “Defendant’s witness” जैसी शब्दावली का तात्पर्य पक्षकार द्वारा प्रस्तुत साक्षी से है — चाहे वह स्वयं पक्षकार हो या अन्य कोई गवाह। अतः यह कहना कि वादी/प्रतिवादी स्वयं साक्षी के रूप में अलग श्रेणी में आते हैं, गलत होगा।
- Order VII Rule 14, Order VIII Rule 1-A, और Order XIII Rule 1 CPC के अंतर्गत, जिरह के समय दस्तावेज प्रस्तुत करना पूर्णतः वैध है — चाहे वह पक्षकार स्वयं हो या उसका कोई साक्षी।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को यह अधिकार न दिया जाए कि वह दस्तावेजों की सहायता से जिरह कर सके, तो उसे अपने पक्ष को पूर्णरूप से प्रस्तुत करने का अवसर नहीं मिलेगा, जिससे मुकदमे की निष्पक्षता पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
प्रासंगिक विधिक प्रावधान
- Order VII Rule 14 CPC – वादी द्वारा दस्तावेजों का उत्पादन
- Order VIII Rule 1-A CPC – प्रतिवादी द्वारा दस्तावेजों का प्रस्तुत करना
- Order XIII Rule 1 CPC – साक्ष्य हेतु दस्तावेजों का उत्पादन
- Indian Evidence Act, Sections 137–139 – मुख्य परीक्षा, जिरह और पुनः परीक्षा की प्रक्रिया
न्यायसम्मत निष्कर्ष
Mohammed Abdul Wahid बनाम Nilofer में सुप्रीम कोर्ट ने यह विधिक रूप से स्थापित किया कि वाद का पक्षकार जब साक्षी के रूप में गवाही देता है, तो वह साक्षी ही माना जाएगा और उससे साक्ष्य अधिनियम और CPC की सभी प्रक्रियाएं समान रूप से लागू होंगी। जिरह के समय दस्तावेजों का प्रयोग — चाहे स्मृति ताज़ा करने के लिए हो या विरोधाभास उजागर करने के लिए — पूरी तरह विधिसम्मत है। इस निर्णय ने उस भ्रम को समाप्त कर दिया जिसमें पक्षकार और साक्षी को दो पृथक श्रेणियों में बांटने का प्रयास किया जा रहा था।