दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आवास पर संदिग्ध आगजनी और कथित नकद की बरामदगी की जांच हेतु तीन सदस्यीय समिति गठित

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स्रोत: भारत का उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट)

भारत के मुख्य न्यायाधीश ने दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश श्री यशवंत वर्मा के विरुद्ध गंभीर आरोपों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह समिति पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति शील नागू, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी.एस. संधावालिया, और कर्नाटक उच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनु शिवरामन को सम्मिलित करती है।

घटना का विवरण:

14 मार्च 2025 की रात, दिल्ली के तुगलक क्रेसेंट स्थित न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के पास एक स्टोर रूम में आग लगने की घटना सामने आई। 15 मार्च को पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा ने इसकी सूचना दी। स्टोर रूम में कथित रूप से जली हुई नकदी मिलने की खबर ने इस मामले को संवेदनशील बना दिया।

घटनास्थल से जो जानकारी सामने आई, उसके अनुसार:

– यह कमरा सामान्य घरेलू सामान जैसे पुराने गद्दे, फर्नीचर आदि के भंडारण के लिए प्रयुक्त होता था।

– कमरा खुला और कई कर्मचारियों की पहुंच में था।

– न्यायमूर्ति वर्मा उस समय भोपाल में थे और उन्हें सूचना उनकी पुत्री द्वारा दी गई।

पुलिस द्वारा मुख्य न्यायाधीश को भेजे गए फोटो और वीडियो में कथित रूप से जली हुई मुद्रा दिखाई गई, जिससे संदेह और गहराया। न्यायमूर्ति वर्मा ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे ‘षड्यंत्र’ बताया और किसी भी प्रकार की नकदी रखने के आरोप को सिरे से नकारा।

मुख्य न्यायाधीश दिल्ली उच्च न्यायालय की रिपोर्ट अनुसार:

– अग्निकांड की सूचना के बाद आग बुझाई गई, लेकिन कथित नकद की कोई आधिकारिक जब्ती या जानकारी परिवार या स्टाफ को नहीं दी गई।

– न्यायमूर्ति वर्मा से उनकी मोबाइल रिकॉर्डिंग, स्टाफ विवरण, तथा कॉल डिटेल्स मांगी गई हैं।

– उन्हें न्यायिक कार्य से फिलहाल पृथक कर दिया गया है।

न्यायमूर्ति वर्मा का उत्तर: 

उन्होंने स्पष्ट किया कि:

– न तो उनके परिवार ने स्टोर में कोई नकदी रखी, न ही कोई जली हुई मुद्रा देखी गई।

– कोई आधिकारिक जब्ती नहीं हुई।

– यह पूरी घटना उन्हें बदनाम करने के लिए रची गई साजिश प्रतीत होती है।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच का आदेश दिया है। 

Source: supreme court press release dated 22/03/2025

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