दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 319 – अपराध में दोषी प्रतीत हो रहे अन्य व्यक्तियों को अभियोजन का सामना करने हेतु तलब करने की शक्ति

मामले एवं विश्लेषण

OMKAR RATHORE & ANR. vs. THE STATE OF MADHYA PRADESH & ANR.

SCR Citation: [2025] 1 S.C.R. 266

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 319 अदालत को यह अधिकार देती है कि अगर ट्रायल के दौरान किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ साक्ष्य सामने आते हैं जो शुरू में आरोपी नहीं बनाया गया था, तो उसे भी मुकदमे में शामिल कर अदालत उसके विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है। यह शक्ति विशेष रूप से तब प्रयोग की जाती है जब अपराध में संलिप्तता के प्रमाण अदालत के समक्ष गवाही या अन्य विधिक साक्ष्यों के रूप में सामने आते हैं।

इस प्रकरण में, प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराने वाले व्यक्ति ने शुरुआत में ही याचिकाकर्ताओं के नाम लिए थे और उनके द्वारा किए गए अपराध को भी स्पष्ट रूप से बताया था। हालांकि, जब पुलिस ने जांच की, तो उसने यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता अपराध में शामिल नहीं थे, एक क्लोजर रिपोर्ट (Final Report) दायर कर दी। इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि उनके खिलाफ कोई पर्याप्त सबूत नहीं मिले, इसलिए उन्हें आरोपी नहीं बनाया गया।

मगर जब अदालत में गवाही हुई, तो उसी प्राथमिकीकर्ता (Complainant) ने अदालत के समक्ष साक्ष्य पेश किए, जिसमें याचिकाकर्ताओं के खिलाफ विशेष प्रत्यक्ष कृत्य (overt act) और उनकी भूमिका बताई गई। इस गवाही के आधार पर एक आवेदन धारा 319 CrPC के तहत दाखिल किया गया, जिसमें अनुरोध किया गया कि याचिकाकर्ताओं को भी अन्य आरोपियों के साथ मुकदमे में सम्मिलित किया जाए।

ट्रायल कोर्ट ने इस आवेदन को स्वीकार करते हुए यह पाया कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य हैं, और इसलिए उन्हें भी मुकदमे में शामिल करना उचित होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही पुलिस ने उन्हें क्लीन चिट दे दी हो, लेकिन न्यायालय अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य के आधार पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने को स्वतंत्र है।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन हाई कोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही माना और स्पष्ट किया कि धारा 319 के अंतर्गत अदालत को यह शक्ति प्राप्त है कि वह किसी भी व्यक्ति को अभियुक्त बना सकती है यदि उसके खिलाफ साक्ष्य मौजूद हों, चाहे पुलिस ने उसका नाम चार्जशीट में डाला हो या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की समीक्षा करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु स्पष्ट किए:

  1. ट्रायल कोर्ट को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति को, जो उस समय आरोपी नहीं है, साक्ष्य के आधार पर आरोपी बना सके।
  2. यह शक्ति इस बात से प्रभावित नहीं होती कि व्यक्ति एफआईआर में नामित था या नहीं, या फिर पुलिस ने उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी या नहीं।
  3. अदालत का निर्णय गवाहों की गवाही जैसे विधिक साक्ष्य पर आधारित होना चाहिए, न कि केस डायरी या पुलिस रिपोर्ट जैसी सामग्री पर, क्योंकि वे “साक्ष्य” की कानूनी श्रेणी में नहीं आते।
  4. क्लोजर रिपोर्ट, जब तक अदालत द्वारा विधिवत स्वीकार नहीं की जाती, तब तक उसका कोई निर्णायक महत्व नहीं होता।
  5. यदि शिकायतकर्ता की गवाही विश्वसनीय और स्वीकार्य प्रतीत होती है, तो पुलिस अधिकारी (Investigating Officer) की व्यक्तिगत राय या संतुष्टि न्यायिक निर्णय को प्रभावित नहीं कर सकती।
  6. यदि हम केवल पुलिस की रिपोर्ट को अंतिम मान लें और अदालत को साक्ष्य के आधार पर निर्णय लेने से रोक दें, तो धारा 319 का उद्देश्य ही निष्फल हो जाएगा।

अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने जो आदेश पारित किया, वह विधि के अनुसार उचित था, और हाई कोर्ट ने उस आदेश को सही ठहराकर कोई गलती नहीं की। हालांकि यह अपेक्षित था कि संबंधित अदालत क्लोजर रिपोर्ट पर पहले विचार करती और डेफैक्टो शिकायतकर्ता को सुनने के बाद उचित आदेश पारित करती, लेकिन चूंकि अब ट्रायल कोर्ट ने धारा 319 के तहत आदेश पारित कर दिया है, इसलिए क्लोजर रिपोर्ट का महत्व गौण हो गया है।

इस निर्णय का भविष्य में न्यायिक प्रक्रिया पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि न्यायालय की शक्ति को स्वतंत्र और सर्वोपरि माना जाएगा। अब अदालत केवल पुलिस द्वारा प्रस्तुत चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहेगी। यदि अदालत के समक्ष ट्रायल के दौरान ऐसे साक्ष्य आते हैं जो यह दर्शाते हैं कि कोई अन्य व्यक्ति भी अपराध में शामिल था तो अदालत उसे आरोपी के रूप में शामिल कर सकती है भले ही पुलिस ने उसे पहले छोड़ दिया हो।

यह निर्णय न्यायपालिका को एक स्पष्ट संकेत देता है कि वह जांच एजेंसी की रिपोर्ट तक सीमित नहीं है और उसे अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर स्वतन्त्र रूप से विचार करने का अधिकार है। इस प्रकार पुलिस जांच की अंतिमता का सिद्धांत कमजोर हो गया है और अदालत की समीक्षा शक्ति को बल मिला है। भविष्य में यदि कोई आरोपी एफआईआर में नामित हो लेकिन चार्जशीट में उसका नाम न हो फिर भी ट्रायल के दौरान उसके विरुद्ध साक्ष्य आएं तो अदालत उसे मुकदमे में शामिल कर सकती है।

इस निर्णय से पीड़ित पक्ष की भूमिका भी सशक्त हुई है। यदि शिकायतकर्ता अदालत में सुसंगत और विश्वसनीय गवाही देता है तो उसे इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि पुलिस ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ आरोप नहीं लगाया है। इससे शिकायतकर्ता या पीड़ित को यह आश्वासन मिलेगा कि यदि जांच में कोई चूक रह भी जाए तो भी अदालत उस व्यक्ति को आरोपी बना सकती है जिसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य ट्रायल में आए हैं।

यह निर्णय भविष्य में उन मामलों में भी महत्वपूर्ण होगा जहां शक्तिशाली या प्रभावशाली व्यक्ति को पुलिस जानबूझकर बचा लेती है। अब ऐसी स्थिति में अदालत स्वतन्त्र रूप से उस व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही कर सकती है यदि गवाहों की गवाही या अन्य साक्ष्य उसकी संलिप्तता दिखाते हैं। इससे न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और पीड़ित उन्मुख बन सकेगी।

धारा 319 के इस निर्णय ने साफ किया कि न्यायालय की शक्ति पुलिस रिपोर्ट से बंधी नहीं है और यह शक्ति मुकदमे की निष्पक्षता और न्याय की सिद्धि के लिए प्रयोग की जा सकती है। इस प्रकार यह निर्णय भविष्य में सैकड़ों मामलों में लागू किया जा सकता है जहां ट्रायल के दौरान किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है लेकिन उसे शुरू में आरोपी नहीं बनाया गया था।

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