“क्या सूचनाकर्ता ही जांचकर्ता हो सकता है? – एनडीपीएस अधिनियम में निष्पक्षता और न्याय की संवैधानिक कसौटी पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय”

मामले एवं विश्लेषण

Mukesh Singh v. State (Narcotic Branch of Delhi), [2020] 9 SCR 245
Special Leave Petition (Criminal) Diary No. 39528 of 2018

एनडीपीएस मामलों में सूचनाकर्ता द्वारा जांच – निष्पक्षता बनाम वैधानिक अनुमति

निर्णायक पीठ: पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ:
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा,
न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी,
न्यायमूर्ति विनीत सरन,
न्यायमूर्ति एम. आर. शाह (मुख्य निर्णय लेखक),
न्यायमूर्ति एस. रविंद्र भट।

मूल मुद्दा:
क्या एक पुलिस अधिकारी जो स्वयं एनडीपीएस अधिनियम के तहत अपराध का सूचनाकर्ता (informant/complainant) है, वही उस अपराध की जांच (investigation) भी कर सकता है? और क्या इस स्थिति में मुकदमा पक्षपातपूर्ण माना जाएगा जिससे अभियुक्त को स्वतः बरी किया जाना चाहिए?

प्रस्तावना:
पूर्व निर्णय Mohan Lal v. State of Punjab, (2018) 17 SCC 627 में यह कहा गया था कि यदि एक ही व्यक्ति सूचनाकर्ता और जांचकर्ता है, तो ऐसी जांच पक्षपातपूर्ण मानी जाएगी और अभियुक्त को बरी कर दिया जाएगा। इस निर्णय की वैधता पर संदेह प्रकट करते हुए इसे एक पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को संदर्भित किया गया।

बहुमत का निर्णय (न्यायमूर्ति एम. आर. शाह द्वारा):
कोर्ट ने Mohan Lal का निर्णय बहुमत से खारिज करते हुए निम्नलिखित मुख्य निष्कर्ष निकाले:

  1. CrPC की धाराएं 154, 156, 157, 173 और NDPS अधिनियम की धारा 51 के अनुसार किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अपराध की सूचना प्राप्त कर उसका स्वयं जांच करना पूरी तरह से वैधानिक है।
  2. NDPS अधिनियम की धारा 53 ऐसे अधिकारियों को जांच के अधिकार देती है जो धारा 42 के अंतर्गत अधिकृत हैं, और यह कहीं नहीं कहा गया कि वे वही अधिकारी न हों।
  3. NDPS अधिनियम में इनबिल्ट सुरक्षा उपाय मौजूद हैं – जैसे धारा 50 (व्यक्ति की तलाशी से पूर्व मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी का विकल्प देना), धारा 52 (गिरफ्तारी के कारण की सूचना देना), धारा 58 (यदि अधिकारी दुर्भावना से कार्य करे तो उस पर दंड) आदि।
  4. कानून में ऐसा कोई सामान्य सिद्धांत नहीं है कि सूचनाकर्ता द्वारा की गई हर जांच पूर्वग्रह से ग्रसित होगी और मुकदमा निष्प्रभावी हो जाएगा।
  5. निष्पक्ष जांच की बात अनुच्छेद 21 के तहत न्यायिक परीक्षण में देखी जानी चाहिए, न कि केवल इस आधार पर कि सूचनाकर्ता और जांचकर्ता एक ही व्यक्ति है।
  6. केवल उसी स्थिति में जांच को पक्षपातपूर्ण माना जाएगा जब अभियुक्त यह साबित कर सके कि जांच से वास्तविक पूर्वग्रह या अन्याय हुआ है।
  7. Mohan Lal, Megha Singh, Bhagwan Singh इत्यादि मामलों में लिए गए विपरीत दृष्टिकोण अब विधिक दृष्टि से मान्य नहीं माने जाएंगे और उन्हें केवल उनके तथ्यों तक ही सीमित माना जाएगा।

न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष (पृष्ठ 302, अनुच्छेद 12):
i. केवल इस आधार पर कि सूचनाकर्ता और जांचकर्ता एक ही है, मुकदमे को दोषपूर्ण या अभियुक्त को स्वतः बरी नहीं किया जा सकता।
ii. Mohan Lal v. State of Punjab का निर्णय और इस विषय में सभी विपरीत दृष्टिकोण अब अवैध घोषित किए गए।
iii. हर मामला तथ्यों के आधार पर जांचा जाएगा।

अभियुक्त पक्ष की मुख्य आपत्तियाँ

  • एनडीपीएस जैसे कानूनों में उल्टे भार का सिद्धांत है (Sections 35, 54), जिससे निष्पक्ष जांच और स्वतंत्र जांचकर्ता आवश्यक है।
  • शिकायतकर्ता खुद जांच करेगा तो पूर्वग्रह और दोषपूर्ण जांच की संभावना बढ़ती है।
  • नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार, कोई भी व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता (Nemo judex in causa sua)।

संबंधित विधिक प्रावधान:

  • NDPS Act, 1985: Sections 41, 42, 43, 50, 51, 52, 53, 54, 58
  • CrPC, 1973: Sections 2(h), 2(o), 154, 156, 157, 173, 465
  • Evidence Act, 1872: Section 114, Illustration (e)
  • Constitution of India: Article 21

उल्लेखनीय निर्णय:

  • Mohan Lal v. State of Punjab, (2018) 17 SCC 627 – Overruled
  • Varinder Kumar v. State of Himachal Pradesh, (2020) 3 SCC 321 – स्पष्टीकरण दिया गया
  • Lalita Kumari v. Govt. of U.P., (2014) 2 SCC 1 – FIR दर्ज करने का कर्तव्य
  • H.N. Rishbud v. State of Delhi, AIR 1955 SC 196 – जांच का दायरा
  • Rafiq Ahmad v. State of U.P., (2011) 8 SCC 300 – “Prejudice” की व्याख्या

अब यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि यदि सूचनाकर्ता और जांचकर्ता एक ही हो तो मात्र इस आधार पर जांच या मुकदमे को अवैध नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक मामले में निष्पक्षता और पूर्वग्रह के आरोपों की जांच साक्ष्य के आधार पर होगी। NDPS अधिनियम की विशेष प्रकृति और उसमें निहित सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखते हुए, पूर्व निर्णय Mohan Lal को अब “अच्छा कानून” नहीं माना जाता।

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