मामला: The Correspondence, RBANMS Educational Institution बनाम बी. गुणशेखर एवं अन्य
निर्णय तिथि: 16 अप्रैल 2025
पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला एवं न्यायमूर्ति आर. महादेवन
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी भी दीवानी मुकदमे में ₹2 लाख या उससे अधिक की राशि नकद रूप में दिए जाने का दावा किया गया है, तो उस जानकारी को अनिवार्य रूप से संबंधित आयकर विभाग को सूचित किया जाना चाहिए। न्यायालय ने माना कि काले धन पर नियंत्रण और डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए आयकर अधिनियम की धारा 269ST और दंडात्मक धारा 271DA का सख्ती से पालन आवश्यक है।
इस मामले में याचिकाकर्ता आरबीएएनएमएस एजुकेशनल इंस्टिट्यूशन, जो 150 वर्ष पुराना एक चैरिटेबल ट्रस्ट है, ने दावा किया कि प्रतिवादी केवल “सेल एग्रीमेंट” के आधार पर अवैध रूप से उनकी संपत्ति पर दावा कर रहे हैं और ₹75 लाख की नकद भुगतान की बात कर रहे हैं, जो न केवल कर कानून का उल्लंघन है, बल्कि “क्लाउडेड टाइटल” के बावजूद केवल स्थायी निषेधाज्ञा की मांग भी विधिक रूप से अपूर्ण है।

न्यायालय ने आदेश VII नियम 11 CPC के तहत याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के आदेशों को रद्द किया और मुकदमा प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। साथ ही निम्नलिखित स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए:
- यदि किसी मुकदमे में ₹2 लाख या उससे अधिक नकद भुगतान का उल्लेख हो, तो अदालत उस जानकारी को संबंधित आयकर विभाग को भेजे।
- पंजीकरण कार्यालयों को भी ऐसे नकद लेन-देन की सूचना आयकर विभाग को देनी होगी।
- यदि किसी कर जांच या छापे के दौरान ऐसे लेन-देन सामने आते हैं और पंजीकरण कार्यालय ने जानकारी नहीं दी है, तो राज्य सरकार मुख्य सचिव के माध्यम से संबंधित अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।
यह फैसला देश में अचल संपत्तियों से जुड़े नकद लेन-देन और फर्जी मुकदमों पर लगाम लगाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।