पावर ऑफ अटॉर्नी धारक प्रबंधक द्वारा दायर शिकायत: धारा 138 एन.आई. एक्ट के अंतर्गत संज्ञान की वैधता”

विधिक समाचार

M/S NARESH POTTERIES vs. M/S AARTI INDUSTRIES AND ANOTHER

SCR Citation:   [2025] 1 S.C.R. 40

धारा 138 एन.आई. एक्ट के तहत प्रबंधक द्वारा दायर शिकायत की वैधता एवं उच्च न्यायालय के आदेश की समीक्षा

संबंधित विधिक प्रावधान: 

– परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 – धारा 138 (चेक अनादरण), धारा 142 (शिकायत की प्रक्रिया) 

– दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 190 (संज्ञान), धारा 200 (शिकायतकर्ता की परीक्षा), धारा 482 (न्यायालय की विवेकाधीन शक्ति)

मामले की पृष्ठभूमि: 

1. अपीलकर्ता फर्म के प्रबंधक और पावर ऑफ अटॉर्नी धारक ने प्रतिवादी संख्या 1 के विरुद्ध धारा 138 N.I. Act के तहत चेक बाउंस की शिकायत दायर की। 

2. मजिस्ट्रेट ने शिकायत की सामग्री को पर्याप्त मानते हुए प्रतिवादी के विरुद्ध समन जारी किया। 

3. प्रतिवादी ने CrPC की धारा 482 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह कहते हुए कार्यवाही को रद्द करने की मांग की कि: 

   – शिकायत त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि 

   – उसमें यह स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया कि प्रबंधक को लेन-देन की जानकारी थी। 

4. उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए समन आदेश और पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उठाए गए प्रमुख प्रश्न: 

1. क्या शिकायत केवल इस आधार पर त्रुटिपूर्ण मानी जा सकती है कि उसमें प्रबंधक की जानकारी का “स्पष्ट कथन” नहीं है? 

2. क्या प्रबंधक, जो पावर ऑफ अटॉर्नी धारक है, शिकायत दायर करने के लिए विधिसम्मत रूप से अधिकृत है? 

3. क्या उच्च न्यायालय द्वारा धारा 482 CrPC के तहत हस्तक्षेप न्यायसंगत था?

  सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (Held):

 1. संज्ञान लेने की प्रक्रिया विधिसम्मत थी: 

– धारा 190 CrPC के तहत मजिस्ट्रेट को अधिकार है कि वह ऐसे मामलों में संज्ञान ले जहां शिकायत में अपराध के तथ्य स्पष्ट रूप से मौजूद हों। 

– धारा 200 CrPC के अनुसार, संज्ञान से पूर्व शिकायतकर्ता और गवाहों की शपथपूर्वक परीक्षा करना आवश्यक है, जो इस मामले में की गई।

 2. धारा 142 NI Act की पूर्ति: 

– शिकायत फर्म के नाम से, उसके अधिकृत प्रबंधक द्वारा दायर की गई थी। 

– चेक भी फर्म के नाम पर जारी हुआ था। 

– अतः यह शिकायत धारा 142 की आवश्यकताओं को पूरा करती है।

 3. प्रबंधक की जानकारी और अधिकरण: 

– प्राधिकरण-पत्र, शपथ-पत्र, और धारा 200 CrPC के अंतर्गत साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि: 

  – प्रबंधक फर्म के दैनिक कार्यों का पर्यवेक्षक था। 

  – उसे लेन-देन की संपूर्ण जानकारी थी। 

  – वह शिकायत दायर करने के लिए विधिसम्मत रूप से अधिकृत था।

 4. “स्पष्ट कथन” की व्याख्या: 

– सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “स्पष्ट कथन” (explicit averment) की कोई कठोर या तकनीकी परिभाषा नहीं है। 

– अगर दस्तावेजों और परिस्थितियों से यह प्रमाणित होता है कि शिकायतकर्ता को जानकारी थी, तो वह पर्याप्त माना जाएगा। 

5. उच्च न्यायालय की त्रुटि: 

– उच्च न्यायालय का आदेश तथ्यात्मक रूप से गलत और कानूनी दृष्टि से त्रुटिपूर्ण था। 

– उसने धारा 482 CrPC की विवेकाधीन शक्ति का अनुचित प्रयोग किया। 

– बिना गंभीर परीक्षण के शिकायत को खारिज करना अनुचित था।

न्यायालय का अंतिम आदेश: 

– उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया गया। 

– मूल शिकायत को पुनः बहाल किया गया और मजिस्ट्रेट को कार्यवाही जारी रखने का निर्देश दिया गया।

निष्कर्ष (Key Takeaway): 

यदि शिकायतकर्ता, चाहे वह पावर ऑफ अटॉर्नी धारक या प्रबंधक ही क्यों न हो, लेन-देन की जानकारी रखता है और विधिपूर्वक अधिकृत है, तो उसकी शिकायत को केवल तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

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