CBI की क्षेत्राधिकारिता एवं कानूनी स्थायित्व

न्यायिक निर्णय

THE STATE, CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION vs. A. SATISH KUMAR & ORS.

SCR Citation: [2025] 1 S.C.R. 130

यह मामला उन प्राथमिकी (FIR) और जांचों से संबंधित है जो सीबीआई द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत दर्ज की गई थीं। ये आरोप उत्तरदाताओं पर लगे थे, जो आंध्र प्रदेश राज्य में कार्यरत केंद्रीय सरकारी कर्मचारी थे। इन प्राथमिकियों को यह कहकर चुनौती दी गई कि राज्य के पुनर्गठन के पश्चात, यानी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के गठन के बाद, सीबीआई को आंध्र प्रदेश राज्य में कोई जांच करने के लिए दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6 के अनुसार राज्य सरकार की सहमति प्राप्त नहीं हुई थी।

क्या राज्य के विभाजन के पश्चात सीबीआई द्वारा की गई FIR और जांच वैध मानी जा सकती हैं जब तक कि पूर्व स्वीकृति को विधिपूर्वक निरस्त न किया गया हो?

1. CBI को सामान्य सहमति का आधार

पूर्ववर्ती अविभाजित आंध्र प्रदेश सरकार ने 14.05.1990 को एक आदेश द्वारा सीबीआई को राज्य भर में जांच के लिए सामान्य सहमति दी थी।

राज्य पुनर्गठन (2014) के बाद भी आंध्र प्रदेश सरकार ने विभिन्न वर्षों (2014, 2016, 2017, 2018) में इस सहमति को न केवल जारी रखा, बल्कि उसका विस्तार भी किया।

इसका सीधा तात्पर्य है कि सीबीआई को निजी व्यक्तियों और केंद्र/राज्य के प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारियों के विरुद्ध भी जांच और कार्यवाही का अधिकार प्राप्त है।

2. उत्तरदाताओं की स्थिति और CBI की वैधता

उत्तरदाता केंद्र सरकार या सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारी थे और उन पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत गंभीर अपराधों का आरोप था।

गृह मंत्रालय का 1963 का प्रस्ताव, जिसके आधार पर सीबीआई की स्थापना हुई थी, यह स्पष्ट करता है कि सीबीआई उन मामलों की जांच करती है जिनमें केंद्र सरकार के अधीन लोक सेवक संलिप्त हों – चाहे अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर।

इसलिए, सीबीआई की कार्यवाही कानूनी रूप से वैध थी।

3. न्यायालयीय क्षेत्राधिकार और FIR का स्थान

उत्तरदाताओं ने यह भी तर्क दिया कि जिन अपराधों की FIR दर्ज की गई वे कुरनूल और अनंतपुर जिलों में घटित हुए, जो अब आंध्र प्रदेश में हैं, जबकि FIR हैदराबाद स्थित CBI/ACB द्वारा दर्ज की गई, और हैदराबाद न्यायालय का इन मामलों पर कोई क्षेत्राधिकार नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्वीकार किया। 07.08.2012 के GOMS के तहत हैदराबाद स्थित सीबीआई अदालत को रायलसीमा क्षेत्र (चित्तूर, अनंतपुर, कडप्पा, कुरनूल) में घटित मामलों की सुनवाई का अधिकार दिया गया था, जो बाद में भी यथावत बना रहा।

4. राज्य पुनर्गठन और कानून की निरंतरता

आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के अनुच्छेद 2(ख) और अनुच्छेद 6 के उपखंड (i) और (ii) के अनुसार, जो भी अधिसूचनाएं या परिपत्र राज्य विभाजन से पूर्व प्रभावी थे, वे तब तक प्रभावशील रहेंगे जब तक उन्हें विधिपूर्वक निरस्त, संशोधित या बदला नहीं जाता।

अतः हैदराबाद स्थित CBI कोर्ट के क्षेत्राधिकार को केवल “आंध्र प्रदेश राज्य” तक सीमित मानना एक विधिक त्रुटि है।

5. न्यायालय का अंतिम निष्कर्ष और आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय द्वारा FIR रद्द करने के निर्णय को निरस्त कर दिया।

संबंधित FIR को बहाल किया गया।

यह स्पष्ट किया गया कि राज्य के पुनर्गठन के बावजूद, जब तक पूर्ववर्ती कानूनी व्यवस्थाओं को विशेष रूप से समाप्त नहीं किया जाता, वे दोनों नए राज्यों पर लागू रहेंगे।

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