उच्चतम न्यायालय ने Jit Vinayak Arolkar बनाम State of Goa and Others, [2025] 1 S.C.R. 230 के मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 415 और 420 की व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया जिसमें कहा गया कि सिविल विवाद को आपराधिक मामला बनाकर न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। इस मामले में वर्ष 2018 में प्रतिवादी संख्या चार ने संपत्ति के स्वामित्व को लेकर बारह सिविल वाद दाखिल किए थे जो न्यायालय में लंबित थे। इसके दो वर्ष बाद वर्ष 2020 में उसी प्रतिवादी ने अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई जिसमें आरोप लगाया गया कि उसने सहमालिकों की सहमति के बिना संपत्ति का एक भाग बेच दिया। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की।
अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसने केवल वी एन और एस एन के हिस्से का विक्रय किया जो स्वयं संपत्ति के हिस्सेदार थे और किसी प्रकार से प्रतिवादी संख्या चार के अधिकार को प्रभावित नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संख्या चार ने सिविल वाद लंबित होने की जानकारी पुलिस से छिपाई और दो वर्ष बाद आपराधिक प्रक्रिया प्रारंभ कराई जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संपत्ति का स्वामित्व विवाद मुख्यतः सिविल प्रकृति का है और अपीलकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी के प्रथम दृष्टया आरोप भी सिद्ध नहीं होते। भारतीय दंड संहिता की धारा 415 के अनुसार धोखाधड़ी का अपराध तभी बनता है जब किसी को जानबूझकर धोखे में रखकर उसकी संपत्ति या प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाई जाए जबकि इस मामले में ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब सिविल विवाद लंबित हो तब उसे आपराधिक रंग देकर प्रताड़ना या दबाव बनाने का प्रयास न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है। न्यायालय ने अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और समस्त कार्यवाहियों को रद्द करते हुए यह व्यवस्था दी कि आपराधिक कानून का प्रयोग न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा बनाए रखने के लिए होना चाहिए न कि द्वेषपूर्ण उद्देश्यों के लिए।
Jit Vinayak Arolkar बनाम State of Goa and Others, [2025] 1 S.C.R. 230 का यह निर्णय भारतीय विधिक प्रणाली में सिविल और आपराधिक कानून की सीमाओं को स्पष्ट रूप से रेखांकित करता है। इससे सिविल विवादों को आपराधिक मामले बनाकर न्यायालयों पर अनावश्यक भार डालने की प्रवृत्ति पर प्रभावी अंकुश लगेगा और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा अक्षुण्ण बनी रहेगी।