“सुप्रीम कोर्ट द्वारा विस्थापितों को प्रतिकर में राहत: भूमि अधिग्रहण विवाद में सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम”

भारतीय कानून

की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम”

MAHANADI COAL FIELDS LTD. & ANR. vs. MATHIAS ORAM & ORS.

SCR Citation: [2025] 1 S.C.R. 158

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड (एमसीएल) द्वारा ओडिशा में अधिग्रहित भूमि के मुआवज़े और पुनर्वास से संबंधित मामलों में अब कोई दोहराव या पुनः निर्धारण की अनुमति नहीं दी जाएगी। कोयला उत्खनन क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957 और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के अंतर्गत इस विवाद की पृष्ठभूमि में 14 गांवों की भूमि अधिग्रहित की गई थी, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष आयोग नियुक्त किया था। इस आयोग का उद्देश्य विस्थापितों के लिए प्रतिकर और पुनर्वास लाभ निर्धारित करना था।

सबसे पहले, गांव गोपालपुर के लिए आयोग ने एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देते हुए “गोपालपुर मॉडल” के रूप में स्वीकृत कर लिया। इसी मॉडल का अनुसरण करते हुए आयोग ने 10 अन्य गांवों के लिए भी रिपोर्टें तैयार कीं, जिन्हें न्यायालय ने अनुमोदित कर दिया। 3 नवम्बर 2022 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि इन 10 गांवों के मामलों में प्रतिकर निर्धारण अंतिम रूप से निपट चुका है, और अब इन मामलों में किसी भी प्रकार की पुनः सुनवाई या मूल्यांकन की अनुमति नहीं दी जा सकती।

इसके बावजूद, चार गांवों—तुमुलिया, झुपुरंगा, रतनसरा और किर्पसरा—के संबंध में विविध आवेदन प्रस्तुत किए गए। याचिकाकर्ताओं ने आयोग के कार्यकाल को बढ़ाने और इन गांवों के लिए पीएएफ/पीडीएफ सूची तैयार करने की मांग की ताकि पुनर्वास और पुनर्स्थापन (R&R) लाभ निर्धारित किए जा सकें। कोर्ट ने इस मांग को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि आयोग का कार्यक्षेत्र पहले से ही न्यायालय द्वारा निर्धारित किया जा चुका था और इसमें कोई भी विस्तार अस्वीकार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पाया कि आयोग ने उन मामलों को स्वीकार कर लिया था, जिनकी रिपोर्टें पहले ही अनुमोदित हो चुकी थीं, और यहां तक कि उन विषयों पर भी कार्यवाही की जो न्यायालय के आदेश के दायरे से बाहर थे—जैसे पुनर्वास स्थलों की उपयुक्तता पर विचार। न्यायालय ने दोहराया कि आयोग को केवल एक सीमित कार्य करना था, जो था पूर्व में अनुमोदित प्रतिकर के पुनः निर्धारण के बाद भुगतान योग्य अंतर की गणना—जिसमें बाज़ार मूल्य, सांत्वना राशि और ब्याज सम्मिलित थे।

एमसीएल द्वारा मूल्य निर्धारण की विधि पर आपत्ति पहले ही दर्ज की जा चुकी थी, और यह मुद्दा अब उच्च न्यायालय में विचाराधीन है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालय को संबंधित याचिका का शीघ्र निपटारा करना चाहिए, और निर्णय आते ही एमसीएल को मुआवज़े की राशि तत्काल भुगतान करनी होगी। इस आदेश से यह सुनिश्चित हुआ कि विस्थापितों को उचित प्रतिकर समय पर मिले, लेकिन आयोग या अन्य प्राधिकरण न्यायालय के आदेश से बाहर जाकर कोई नया या समानांतर प्रक्रिया न अपनाएं।

इस निर्णय का सामाजिक और विधिक महत्व यह है कि यह भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करता है, लेकिन साथ ही न्यायिक निर्देशों की मर्यादा बनाए रखने की अनिवार्यता को भी रेखांकित करता है। कोर्ट का यह आदेश न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता को बल देता है, बल्कि भविष्य में ऐसी जटिल पुनर्वास प्रक्रियाओं में स्पष्ट दिशा-निर्देशों के पालन का भी मार्ग प्रशस्त करता है।

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