सुप्रीम कोर्ट में गर्मागर्म बहस: AoR के खिलाफ न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी के आदेश पर वकीलों की आपत्ति

न्यायिक प्रक्रिया

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को उस समय तीखी बहस देखने को मिली जब न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने एक वकील (एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड) को “बेकार और भ्रामक याचिका” दायर करने को लेकर फटकार लगाई।

मामला ‘एन. ईश्वरनाथन बनाम राज्य’ से जुड़ा हुआ है, जिसमें अदालत ने याचिकाकर्ता और वकील पर तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने और पूर्व के आदेश का पालन न करने का आरोप लगाया।

जब अदालत ने AoR पी. सोमा सुंदरम को कोर्ट की अवमानना के तहत कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात कही, तो वहां मौजूद अधिवक्ताओं, जिनमें सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के सदस्य शामिल थे, ने तीव्र विरोध दर्ज कराया।

वकीलों ने इसे पूर्व-नियोजित आदेश बताया और कहा कि संबंधित वकील को बिना सुने दोषी ठहराया जा रहा है। कई वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय से आग्रह किया कि AoR को स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाए।

विरोध के बाद अदालत ने अपने आदेश को संशोधित करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता और उनके वकील यह स्पष्ट करें कि किस परिस्थिति में दूसरी विशेष अनुमति याचिका (SLP) तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर दायर की गई। कोर्ट ने एक सप्ताह में शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है और याचिकाकर्ता को 9 अप्रैल को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा है।

यह मामला अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत दोष सिद्ध हुए अभियुक्तों से जुड़ा है, जिन्हें सत्र न्यायालय ने तीन साल की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय से अपील खारिज होने के बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और आत्मसमर्पण से छूट मांगी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

इसके बावजूद, उन्होंने एक और याचिका दाखिल कर फिर से राहत मांगी, जिससे कोर्ट ने नाराजगी जताई और वकील को कठघरे में खड़ा किया।

वरिष्ठ अधिवक्ता एस नागमुत्तु समेत कई वकीलों ने कहा कि AoR को पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया और कोर्ट की कठोर टिप्पणी उनके करियर पर असर डाल सकती है। वकीलों का यह भी कहना था कि यह आदेश “अति शीघ्र और कठोर” प्रतीत होता है।

अब यह मामला 9 अप्रैल को फिर से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तब तक वकील और याचिकाकर्ता अपने-अपने पक्ष में शपथपत्र दाखिल करें।

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