भारत के विशिष्ट न्यायाधीश श्री पी.एन. भगवती

भारतीय कानून

भारत के न्यायिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिन्होंने न केवल कानून की व्याख्या की, बल्कि न्याय को आम जनता के लिए सुलभ और सजीव बना दिया। ऐसे ही एक प्रेरणादायी न्यायाधीश रहे माननीय श्री पी.एन. भगवती, जो 12 जुलाई 1985 को भारत के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए और 20 दिसंबर 1986 को सेवानिवृत्त हुए।

21 दिसंबर 1921 को जन्मे श्री पी.एन. भगवती, प्रसिद्ध शिक्षाविद् स्व. एन.एच. भगवती के सुपुत्र थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बॉम्बे (अब मुंबई) में पूरी की और मैट्रिकुलेशन परीक्षा में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इसके पश्चात एल्फिन्स्टन कॉलेज, बॉम्बे से गणित (ऑनर्स) में प्रथम श्रेणी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की और उसी कॉलेज में फेलो भी नियुक्त किए गए।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी उन्होंने भाग लिया। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे गिरफ़्तार हुए और बाद में चार महीने तक भूमिगत रहे। आंदोलन के पश्चात उन्होंने गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, बॉम्बे से कानून की पढ़ाई की और प्रथम श्रेणी में डिग्री प्राप्त की।

न्यायिक क्षेत्र में उनका करियर बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत से प्रारंभ हुआ। 21 जुलाई 1960 को वे गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने और 16 सितंबर 1967 को गुजरात उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर आसीन हुए। 17 जुलाई 1973 को उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

न्यायमूर्ति भगवती न्यायिक सुधारों, निःशुल्क विधिक सहायता, और जनहित याचिकाओं (PILs) के प्रणेता माने जाते हैं। वे गुजरात सरकार द्वारा गठित निःशुल्क विधिक सहायता समिति, न्यायिक सुधार समिति, और राज्य विधिक सहायता पायलट परियोजना के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने सामाजिक न्याय को व्यवहारिक स्वरूप देने हेतु अनेक नवाचार किए।

शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे भारतीय विद्या भवन, अहमदाबाद केंद्र के अध्यक्ष और हरिलाल भगवती पत्रकारिता संस्थान के प्रमुख थे। साथ ही, वे गुजरात विश्वविद्यालय और एम.एस. विश्वविद्यालय, बड़ौदा की सेनाओं के सदस्य भी रह चुके थे।

अपने न्यायिक कार्यकाल में, श्री पी.एन. भगवती ने भारतीय संविधान की व्याख्या को आमजन से जोड़ा और न्याय को सामाजिक न्याय के रूप में परिभाषित करने में अग्रणी भूमिका निभाई।

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