न्यूयॉर्क/किगाली। 7 अप्रैल
हर वर्ष 7 अप्रैल को विश्व भर में “1994 में तुत्सी के विरुद्ध हुए जनसंहार पर अंतर्राष्ट्रीय चिंतन दिवस” मनाया जाता है। यह दिन रवांडा में घटित उस भीषण मानव त्रासदी की याद दिलाता है, जब महज़ 100 दिनों के भीतर अनुमानतः आठ लाख से अधिक तुत्सी समुदाय के लोग, साथ ही हुतु और अन्य लोग जो इस हिंसा का विरोध कर रहे थे, मारे गए।
संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और घोषणाएँ
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 23 दिसंबर 2003 को प्रस्ताव A/RES/58/234 के माध्यम से 7 अप्रैल को “International Day of Reflection on the Genocide in Rwanda” घोषित किया। इस दिन को विश्व के सभी सदस्य राष्ट्रों, संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के संगठनों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा नागरिक समाज संगठनों से विशेष गतिविधियों और स्मृति आयोजनों द्वारा मनाने का आग्रह किया गया।
बाद में 26 जनवरी 2018 को महासभा ने प्रस्ताव A/72/L.31 द्वारा इस दिवस का नाम बदलकर “International Day of Reflection on the 1994 Genocide against the Tutsi in Rwanda” कर दिया, जिसमें यह भी स्वीकार किया गया कि इस जनसंहार में तुत्सी समुदाय के साथ-साथ हुतु और अन्य वे लोग भी मारे गए, जो इस हिंसा के विरुद्ध थे।
जनसंचार कार्यक्रम और शिक्षा का विस्तार
20 अप्रैल 2020 को, महासभा ने प्रस्ताव A/RES/74/273 द्वारा इस विषय पर संयुक्त राष्ट्र के जागरूकता कार्यक्रम का शीर्षक परिवर्तित करते हुए इसे “Outreach Programme on the 1994 Genocide against the Tutsi in Rwanda and the United Nations” नाम दिया और नागरिक समाज को इस स्मृति और शिक्षा अभियान से जोड़ने का आह्वान किया, ताकि भविष्य में ऐसे कृत्यों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

रवांडा में शोक का समय: अप्रैल से जुलाई
रवांडा में हर वर्ष 7 अप्रैल को “क्विबुका (Kwibuka)” नामक राष्ट्रीय स्मरण दिवस के साथ शोक की अवधि की शुरुआत होती है, जो 4 जुलाई को “लिबरेशन डे” के साथ समाप्त होती है। यह समय पीड़ितों की स्मृति, सामूहिक healing और शांति की दिशा में राष्ट्रीय और सामाजिक प्रयासों का प्रतीक बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय और विश्व भर में आयोजन
हर साल इस दिन या इसके आसपास संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय (न्यूयॉर्क) एवं अन्य वैश्विक कार्यालयों में स्मृति कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें जनसंहार से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को साझा किया जाता है, पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी जाती है और वैश्विक समुदाय को यह संदेश दिया जाता है कि “कभी दोबारा नहीं” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक साझा उत्तरदायित्व है।