“बहुपक्षीयता कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है जब हम एक अधिक समान, लचीला और टिकाऊ विश्व का निर्माण कर रहे हैं।” – महासचिव एंटोनियो गुटेरेस
बहुपक्षीयता कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है जब हम एक अधिक समान, लचीला और टिकाऊ विश्व का निर्माण कर रहे हैं। बहुपक्षीयता का पारंपरिक अर्थ होता है – ऐसा संयुक्त प्रयास जिसमें कम से कम तीन पक्ष या देश किसी साझा समस्या का समाधान करने के लिए मिलकर कार्य करें। इसका आधार यह समझ होता है कि सामूहिक प्रयास से जटिल वैश्विक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है, जो किसी एक देश के वश में नहीं होता। बहुपक्षीयता एक दृष्टिकोण है जो यह मानता है कि “एकजुट होकर हम अधिक मजबूत हैं।” यही भावना आज की वैश्विक चुनौतियों का उत्तर है – जलवायु परिवर्तन, शांति और सुरक्षा, सतत विकास और मानवाधिकार जैसे मुद्दों पर।
संयुक्त राष्ट्र वर्तमान वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था की रीढ़ है। इसकी स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक शांति और सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। यह मंच आज 193 सदस्य देशों को एकजुट कर अंतरराष्ट्रीय मामलों पर संवाद, सहमति और कार्रवाई सुनिश्चित करता है। इसके ज़रिए सरकारें, नागरिक संस्थाएं, व्यवसाय और आम लोग मिलकर सतत विकास लक्ष्य जैसे उद्देश्यों पर काम करते हैं। विभिन्न एजेंसियों और वैश्विक संधियों के माध्यम से यह एक समन्वित प्रयास का केंद्र बना है।
बहुपक्षीय सहयोग का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन सभ्यताओं में व्यापार, वित्त और राजनीतिक संबंधों को नियंत्रित करने वाले समझौते इसके प्रमाण हैं। आधुनिक बहुपक्षीयता की नींव वेस्टफेलिया संधियों (1648) में पड़ी, जिन्होंने यूरोप में युद्धों को समाप्त किया। 20वीं सदी में लीग ऑफ नेशंस (1920) और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना ने इसे संस्थागत रूप दिया। इसके बाद यह व्यवस्था विभिन्न संगठनों, क्षेत्रीय इकाइयों और वैश्विक संधियों के ज़रिए और मज़बूत होती गई।
बहुपक्षीय व्यवस्था कुछ मूल सिद्धांतों पर आधारित है। यह मानती है कि जटिल वैश्विक समस्याओं का समाधान एकल देशों से नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों से होता है। इसमें सभी देशों को आकार या शक्ति के बिना समान भागीदारी का अधिकार होता है। यह अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मानकों का पालन सुनिश्चित करता है तथा सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन के साथ विकास को प्राथमिकता देता है। बहुपक्षीय दृष्टिकोण में बल प्रयोग के स्थान पर संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी जाती है।
2015 में अपनाए गए 2030 सतत विकास एजेंडा ने बहुपक्षीयता को नई दिशा दी। इसमें 17 सतत विकास लक्ष्य (SDGs) शामिल हैं जो गरीबी, असमानता, जलवायु परिवर्तन और मानवाधिकार जैसे मुद्दों का समाधान प्रस्तुत करते हैं। “किसी को पीछे न छोड़ें” की भावना इस एजेंडा की आत्मा है। यह एजेंडा आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय को भी केंद्र में रखता है।
वास्तविक जीवन में बहुपक्षीय व्यवस्था ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं। खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में कोडेक्स एलीमेंटेरियस जैसे वैश्विक मानक उपभोक्ताओं की सुरक्षा और व्यापार की पारदर्शिता को सुनिश्चित करते हैं। टीकाकरण और वैश्विक स्वास्थ्य में WHO, UNICEF और GAVI जैसे संगठनों ने लाखों लोगों को सुरक्षित किया है। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे प्रयासों ने ओज़ोन परत की रक्षा की। हथियार नियंत्रण में परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए NPT संधि एक महत्वपूर्ण सफलता रही है। वैश्विक व्यापार और आर्थिक विकास के लिए बहुपक्षीय तंत्र ने संतुलित और टिकाऊ अवसर प्रदान किए हैं। आपातकालीन स्थितियों और आपदाओं में मानवीय सहायता का संचालन भी इसी व्यवस्था के अंतर्गत होता है।
बहुपक्षीयता हमारे दैनिक जीवन को भी बेहतर बनाती है। खाद्य मानक, टीका उपलब्धता, स्वच्छ जल, सड़क सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और बौद्धिक संपदा संरक्षण जैसे क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग ने आम जन-जीवन को सीधे प्रभावित किया है। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि बहुपक्षीय सहयोग ने न केवल नीतिगत स्तर पर, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी सकारात्मक परिवर्तन लाए हैं।
हालांकि, बहुपक्षीयता को आज कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रवाद और एकपक्षीय नीतियों के बढ़ते प्रभाव, आर्थिक अस्थिरता, महामारी और जलवायु संकट जैसे विषय इसके प्रभाव को कमजोर करते हैं। कई संस्थाएं संसाधनों की कमी से भी जूझ रही हैं। इसके साथ ही, वैश्विक सत्ता संतुलन में बदलाव को देखते हुए बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता भी जताई जा रही है।

इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, 2021 में महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने “हमारी साझा कार्यसूची” (Our Common Agenda) पेश की, जिसमें बहुपक्षीय व्यवस्था को अधिक समावेशी और प्रभावशाली बनाने का दृष्टिकोण था। 2024 के “भविष्य का शिखर सम्मेलन” (Summit of the Future) में वैश्विक नेताओं ने “भविष्य का समझौता” (Pact for the Future) अपनाया, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर और सतत विकास लक्ष्यों को दोहराते हुए वैश्विक सहयोग को मज़बूत करने के लिए प्रमुख कदम सुझाए गए।
आज की दुनिया में बहुपक्षीय व्यवस्था केवल एक नीति नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और साझा प्रगति का आधार बन चुकी है। एकजुट प्रयासों और वैश्विक साझेदारी से ही हम आने वाली चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं और 2030 एजेंडा के लक्ष्यों को साकार कर सकते हैं।