अदालतों में क्षेत्रीय भाषाओं के उपयोग को लेकर केंद्र सरकार का स्पष्टीकरण

न्यायिक प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 348(1)(क) के अनुसार, उच्चतम न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की कार्यवाहियां अंग्रेज़ी में ही होंगी। हालांकि, अनुच्छेद 348(2) यह अनुमति देता है कि किसी राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उस राज्य के उच्च न्यायालय की प्रधान पीठ में हिंदी या राज्य की अन्य राजभाषा का उपयोग करने की स्वीकृति दे सकता है। साथ ही, राजभाषा अधिनियम, 1963 की धारा 7 के अंतर्गत भी ऐसे आदेश, निर्णय या डिक्री के लिए हिंदी या राज्य की भाषा के उपयोग की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते उनका अधिकृत अंग्रेज़ी अनुवाद भी संलग्न हो।

1965 में गठित कैबिनेट समिति ने यह तय किया था कि किसी भी उच्च न्यायालय में अंग्रेज़ी के अतिरिक्त किसी भाषा के उपयोग से पहले भारत के प्रधान न्यायाधीश की सहमति ली जानी आवश्यक है। इसी आधार पर राजस्थान उच्च न्यायालय में 1950 से हिंदी का उपयोग अधिकृत किया गया, जबकि उत्तर प्रदेश (1969), मध्य प्रदेश (1971) और बिहार (1972) में यह अनुमति बाद में दी गई।

हाल के वर्षों में तमिलनाडु, गुजरात, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक सरकारों ने अपनी-अपनी भाषाओं (तमिल, गुजराती, हिंदी, बंगाली, कन्नड़) के उपयोग की अनुमति मांगी, परंतु 2012 और पुनः 2016 में सर्वोच्च न्यायालय की फुल कोर्ट ने इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय की दिल्ली के बाहर पीठ स्थापित करने संबंधी याचिकाओं और लॉ कमीशन की 125वीं रिपोर्ट के आधार पर भी विचार हुआ, लेकिन 2010 में फुल कोर्ट ने इसे न्यायसंगत नहीं पाया। इस मुद्दे पर दायर रिट याचिका संख्या WP(C) 36/2016 में 13 जुलाई 2016 को यह मामला संविधान पीठ को भेजा गया, और यह अभी विचाराधीन है।

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