सुप्रीम कोर्ट ने ‘झूठे विवाह वादे’ के आधार पर रेप केस को बताया “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग”

न्यायिक निर्णय

 सुप्रीम कोर्ट ने ‘झूठे विवाह वादे’ के आधार पर रेप केस को बताया “कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” – 16 साल पुराने रिश्ते को माना सहमति से बना संबंध

सुप्रीम कोर्ट ने RAJNISH SINGH @ SONI बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [2025] 3 S.C.R. 303 मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। यह केस उस महिला की शिकायत पर आधारित था, जिसने 16 वर्षों तक आरोपी के साथ संबंध बनाए रखने के बाद उसके खिलाफ बलात्कार और अन्य आपराधिक धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई थी।

न्यायालय ने यह माना कि इतने लंबे समय तक सहमति से बनाए गए संबंधों को अब “बलात्कार” करार देना, भारतीय दंड संहिता की धारा 376 का अनुचित प्रयोग है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई साक्षर और वयस्क महिला लंबे समय तक स्वेच्छा से संबंध बनाए रखती है, तो उसे बाद में बलात्कार का आरोप लगाने का अधिकार नहीं हो सकता, जब तक कि बलपूर्वक या धोखे की स्थिति स्पष्ट रूप से सामने न आए।

 मामले की प्रमुख बातें:

– शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने झूठे विवाह के वादे पर उसके साथ 16 वर्षों तक यौन शोषण किया। 

– आरोपी के खिलाफ IPC की धाराएँ 376, 384, 323, 504, 506 के तहत चार्जशीट दायर की गई थी। 

– आरोपी ने कार्यवाही को रद्द करने हेतु CrPC की धारा 482 के तहत उच्च न्यायालय का रुख किया, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। 

– सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए एफआईआर और समस्त कार्यवाही को निरस्त कर दिया। 

 न्यायालय का अवलोकन:

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने जानबूझकर और स्वेच्छा से इतने वर्षों तक आरोपी के साथ संबंध बनाए रखे, यहां तक कि वह स्वयं को कई बार आरोपी की पत्नी के रूप में प्रस्तुत करती रही। इसलिए इसे “झूठे वादे पर बलात्कार” नहीं माना जा सकता। 

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब तक महिला को यह ज्ञात नहीं हुआ कि आरोपी ने किसी और से शादी कर ली है, तब तक उसने कोई शिकायत नहीं की। इतना लंबा समय (16 वर्ष) चुप्पी साधे रखना स्वयं इस बात का प्रमाण है कि संबंधों में सहमति थी।

 फैसले का महत्व:

यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह के वादे से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण दिशा प्रदान करता है। कोर्ट ने दोहराया कि कानून का दुरुपयोग कर किसी को फंसाना न्याय व्यवस्था के साथ अन्याय है।

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