अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन और अन्य व्यापारिक साझेदार देशों के खिलाफ एक नई टैरिफ नीति की घोषणा की है, जो 9 अप्रैल 2025 से लागू होगी। इस नीति के तहत चीन से अमेरिका में आने वाले सामानों पर कुल 54 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया जाएगा। यह निर्णय तथाकथित “राष्ट्रीय व्यापार आपातकाल” के तहत लिया गया है और इसका उद्देश्य अमेरिका की घरेलू अर्थव्यवस्था और उत्पादकों को विदेशी व्यापारिक दबाव से बचाना बताया गया है।
इस टैरिफ नीति के अंतर्गत अमेरिका ने सभी आयातित वस्तुओं पर एक सार्वभौमिक 10 प्रतिशत “मूल शुल्क” लागू करने का निर्णय लिया है, जो 5 अप्रैल से प्रभाव में आएगा। इसके अलावा, चीन से आने वाले उत्पादों पर पहले से ही 20 प्रतिशत टैरिफ लागू है, जिसमें अब 34 प्रतिशत और जोड़े जाने से कुल शुल्क 54 प्रतिशत हो जाएगा। राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि यह दर चीन द्वारा अमेरिकी वस्तुओं पर लगाए जा रहे शुल्क से कम है, जिसे वे लगभग 67 प्रतिशत बताते हैं।
इस फैसले से चीन के निर्यातकों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना है। अमेरिका में चीनी उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता घटेगी, जिससे व्यापार की गति धीमी हो सकती है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है, विशेष रूप से टेक्नोलॉजी, फार्मास्युटिकल्स और औद्योगिक मशीनरी जैसे क्षेत्रों में। अमेरिका का यह कदम दुनिया भर में व्यापारिक असंतुलन पैदा कर सकता है, क्योंकि चीन के साथ-साथ अन्य साझेदार देशों को भी संभावित टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है।
चीन इस निर्णय के जवाब में कड़े कदम उठा सकता है। इसमें अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क, अमेरिकी कंपनियों पर नियमों का कड़ा अनुपालन, और निवेश पर प्रतिबंध शामिल हो सकते हैं। हालाँकि, व्यापार विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों देशों के बीच अभी भी बातचीत की संभावना खत्म नहीं हुई है और भविष्य में समझौते का मार्ग खुला रह सकता है।

यह नीति केवल चीन तक सीमित नहीं है। संकेत मिल रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन आने वाले समय में सेमीकंडक्टर, दवाइयाँ और महत्वपूर्ण खनिजों जैसे क्षेत्रों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाने की योजना बना रहा है। इससे वैश्विक व्यापार ढांचे में और अस्थिरता आ सकती है और अमेरिका के अपने कुछ सहयोगी देशों के साथ भी तनाव बढ़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन की यह नीति वैश्विक व्यापार में अमेरिका की आक्रामक रणनीति को दर्शाती है। यह केवल आयात को महँगा करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह एक भू-राजनीतिक संदेश भी है कि अमेरिका अब अपनी शर्तों पर वैश्विक व्यापार को पुनः परिभाषित करना चाहता है। आने वाले समय में यह देखा जाना बाकी है कि यह नीति अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी सिद्ध होती है या वैश्विक स्तर पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है।