समन आदेश तथा शिकायत दोनों को रद्द किया गया

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VISHNOO MITTAL बनाम M/S SHAKTI TRADING COMPANY
SCR उद्धरण: [2025] 4 S.C.R. 41
तारीख: 17 मार्च 2025
न्यायाधीश: माननीय श्री न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया
प्रकरण प्रकार: आपराधिक अपील /1287/2025
निर्णय: अपील स्वीकार की गई
न्यूट्रल सिटेशन: 2025 INSC 346

मुख्य बिंदु (हेडनोट)

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 – धारा 482,
परिचालित लिखत अधिनियम, 1881 – धारा 138,
दीवाला और दिवालियापन संहिता, 2016 – धारा 14, 17 –

दिनांक 25.07.2018 को मोराटोरियम आदेश प्रभावी हुआ। इसके पश्चात 06.08.2018 को अपीलकर्ता (कॉरपोरेट देनदार का पूर्व निदेशक) को धारा 138, एनआई अधिनियम के अंतर्गत डिमांड नोटिस भेजा गया।

उच्च न्यायालय ने P. Mohan Raj मामले पर निर्भर रहते हुए धारा 482 CrPC के अंतर्गत अपीलकर्ता की याचिका खारिज कर दी थी।

निर्णय: विवादित आदेश निरस्त।

एनआई अधिनियम की धारा 138 के प्रावधान के खंड (ग) के अनुसार, कारण का उत्पत्ति केवल तभी मानी जाती है जब डिमांड नोटिस दिया गया हो और 15 दिन की समयावधि में भुगतान न किया गया हो। केवल चेक के अनादरण मात्र से धारा 138 का अपराध उत्पन्न नहीं होता।

उच्च न्यायालय द्वारा P. Mohan Raj पर निर्भर रहना अनुचित था क्योंकि उस मामले के तथ्य भिन्न थे; वहाँ धारा 138 के अंतर्गत कारण मोराटोरियम से पूर्व उत्पन्न हुआ था, जबकि वर्तमान मामले में कारण मोराटोरियम के बाद उत्पन्न हुआ।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि IBC की धारा 14 केवल कॉरपोरेट देनदार के विरुद्ध कार्यवाही पर प्रतिबंध लगाती है, प्राकृतिक व्यक्तियों (जैसे निदेशक) के विरुद्ध नहीं।

साथ ही, जब नोटिस भेजा गया, उस समय अपीलकर्ता कॉरपोरेट देनदार के निदेशक पद से निलंबित हो चुके थे, क्योंकि 25.07.2018 को IRP की नियुक्ति के साथ ही उनका पद प्रभावहीन हो गया था।

सभी बैंक खाते अब IRP के नियंत्रण में थे, इसलिए अपीलकर्ता के लिए राशि का भुगतान संभव नहीं था। यह स्थिति IBC की धारा 17 के प्रकाश में देखी गई।

इसलिए समन आदेश तथा शिकायत दोनों को रद्द किया गया।

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