अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में कुछ प्रमुख कानून फर्मों के खिलाफ लिए गए कार्यकारी आदेशों ने अमेरिका की न्याय व्यवस्था में गंभीर चिंता पैदा कर दी है। इन फर्मों पर यह कार्रवाई उनके पूर्व ग्राहकों या कर्मचारियों के आधार पर की गई है, जिनमें कुछ ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जांचों में भूमिका निभाई थी।
इस घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब ट्रंप ने एक कार्यकारी आदेश जारी कर हिलेरी क्लिंटन के चुनाव अभियान से जुड़ी फर्म परकिन्स कुई को निशाना बनाया। इसके बाद एक के बाद एक आदेशों में अन्य प्रतिष्ठित फर्मों—जैसे पॉल वीस, जेनर एंड ब्लॉक, और विल्मरहेल—को भी निशाने पर लिया गया। आरोप था कि ये फर्म “पक्षपातपूर्ण” ग्राहकों का प्रतिनिधित्व करती रही हैं।
इन आदेशों का असर न केवल उन फर्मों की प्रतिष्ठा पर पड़ा, बल्कि यह भी संकेत मिला कि राष्ट्रपति का यह कदम ऐसे अधिवक्ताओं पर दबाव बनाने का तरीका है, जो प्रशासन की नीतियों को अदालत में चुनौती दे सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधिक प्रणाली को कमजोर करने की दिशा में गंभीर कदम है।
कई कानून फर्मों ने इन आदेशों को संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है और अदालतों में चुनौती दी है। कुछ ने अस्थायी राहत भी प्राप्त की है, जिससे आदेशों के कुछ हिस्सों को रोका गया है। हालांकि कुछ फर्मों ने मुकदमेबाज़ी से बचने के लिए ट्रंप प्रशासन के साथ समझौते किए हैं, जिनमें करोड़ों डॉलर की मुफ्त कानूनी सेवाओं की पेशकश शामिल है।
इन घटनाओं से यह संकेत मिला है कि बड़ी फर्में राजनीतिक दबाव में आकर अपनी स्वतंत्रता खोने के कगार पर पहुँच रही हैं। कुछ फर्मों के पूर्व ग्राहकों ने अपने मामलों से उन्हें हटा लिया, जिससे यह धारणा बनी कि सरकार के विरोध में खड़ा होना अब फर्मों के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।
ट्रंप प्रशासन ने अपने बचाव में कहा है कि ये कदम “राष्ट्रहित” में हैं और उन फर्मों के खिलाफ हैं जो कथित तौर पर न्याय विभाग के खिलाफ अनुचित मुकदमेबाज़ी में शामिल रही हैं। साथ ही, प्रशासन ने यह भी दावा किया कि कुछ फर्मों ने नस्लीय आधार पर भेदभावपूर्ण भर्तियाँ की हैं, जो उनके खिलाफ कार्रवाई का आधार बनीं।
इस पूरे प्रकरण से न केवल वकालत पेशे की स्वतंत्रता पर असर पड़ा है, बल्कि इससे अमेरिका की न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति, संगठन और प्रतिनिधित्व के अधिकार पर भी प्रश्न खड़े हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने भी ट्रंप की जजों के खिलाफ टिप्पणी की आलोचना की और न्यायिक फैसलों से असहमति को महाभियोग के आधार पर खारिज कर दिया।
यह सिलसिला केवल वकीलों तक सीमित नहीं रहा। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस तरह की कार्रवाइयाँ बिना बाधा के जारी रहती हैं, तो इसका असर न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और आम नागरिकों के सरकार को चुनौती देने के अधिकार पर भी पड़ेगा।

इस पूरे मामले ने कानूनी जगत को झकझोर दिया है। सैकड़ों पूर्व न्याय विभाग अधिकारियों ने ट्रंप के आदेशों की आलोचना करते हुए बयान जारी किया है। अमेरिकन बार एसोसिएशन और कई स्थानीय बार संगठनों ने भी इस नीति का कड़ा विरोध किया है।
विशेषज्ञों की राय है कि अगर सरकार ऐसे आदेशों के जरिए वकीलों और फर्मों को निशाना बनाना जारी रखती है, तो इसका अंततः असर लोकतंत्र की नींव और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर पड़ेगा। इस घटनाक्रम को देखकर यह स्पष्ट होता है कि सरकार की नीतियों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकीलों को दबाव में लाना एक नया और खतरनाक चलन बन सकता है।